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“गाँव का विकास: रेत, मिट्टी और पत्थर तक या मानव संसाधन तक?

फ्रंट पेज न्यूज़,  मुख्य संपादक (प्रमेश शर्मा) की कलम से

गाँव की सरकार से उम्मीद
चुनावी रण थमा है अब, बज चुका विजय का शंख,
महीनों तक जो जोड़-तोड़ थे, अब उनका हुआ है अंत।


रातों-रात समीकरण बदले, कितने चेहरे हुए उदास,
कितनों के मन में सपने जागे, कितनों ने बाँधी नई आस।
तीस और इकतीस मई ने, अपना अंतिम निर्णय दिया,
गाँव की सत्ता का दायित्व, कई नए हाथों को सौंप दिया।


उनके मन में भी होगा उत्साह, कुछ कर दिखलाने का अरमान,
पर असली पहचान तभी होगी, जब आएगा कर्म का मैदान।


सड़कें, नालियाँ, भवन बनेंगे, यह क्रम चलता आया है,
पत्थर, सीमेंट और लोहे पर, कितना धन भी लगाया है।


पर सोचो, यदि मानव ही कमजोर, दिशाहीन और लाचार रहे,
तो ये सारी ऊँची इमारतें भी कब तक अपना भार सहे?


गाँव का असली धन तो युवा है, उसकी शक्ति, उसका ज्ञान,
खेल मैदानों की गूँज में है, भविष्य का स्वर्णिम अभियान।


पुस्तकालय की शांत शरण में, सपनों को आकार मिले,
जागरूकता के दीप जलें तो, जीवन को नए विचार मिले।


नशे की खेती, नशे का व्यापार, दोनों से दूरी बनानी है,
नई पीढ़ी के कोमल मन को, सच्ची राह दिखानी है।


नैतिकता के बीज बोएँ हम, संस्कारों का जल दें साथ,
तभी सुरक्षित होगा कल और, उज्ज्वल होगी जीवन-रात।


हर समस्या का हल ऐसा हो, जिसमें प्रेम और अपनापन हो,
गाँव की मिट्टी, गाँव की संस्कृति, दोनों का सम्मान सदा हो।


निर्णय केवल कागज़ पर नहीं, जनमन की धड़कन बन जाए,
पंचायत की हर नई नीति, जनहित का दर्पण बन जाए।


प्रकृति, संस्कृति और परंपरा, ये केवल शब्द नहीं धरोहर हैं,
इनके बिना गाँवों की आत्मा, सूखे वृक्ष समान बंजर हैं।


यदि मानव संसाधन सशक्त हुआ, तो सब कुछ फिर खिल जाएगा,
गाँव का हर आँगन, हर चौबारा, नव विकास से भर जाएगा।


हे नव-निर्वाचित प्रतिनिधियों! अब इतिहास तुम्हें पुकार रहा,
निर्जीव वस्तुओं से आगे बढ़, मानव विकास निहार रहा।


ऐसी नीति का दीप जलाओ, जो जन-जन का विश्वास बने,
गाँव की सरकार तभी सफल हो, जब मानव ही विकास बने।॥

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