कहते हैं,
सब ठीक है,
रिपोर्टों में विकास है,
फाइलों में चमकती सड़कें हैं,
और भाषणों में हिमाचल फिर से खास है।
पर गाँव अभी भी पूछ रहा है —
“भाई, सड़क कब खुलेगी?”
क्योंकि बरसात गए एक साल होने को आया,
पर पहाड़ का घाव अभी भी धँसा पड़ा है।

त्रासदी 2025 आई थी,
पहाड़ रोया था,
नदियाँ उफनी थीं,
घर, खेत, पुल — सब बह गए थे।
तब कहा गया था —
“हम आपके साथ हैं।”
अब साथ इतना है कि
लोग पैदल चल रहे हैं,
और सरकार प्रेस नोटों में।
ग्रामीण सड़कें आज भी
पत्थरों के नीचे दबी पड़ी हैं,
पर राजधानी में योजनाएँ
फोटो खिंचवा रही हैं।
गाँव का बूढ़ा आज भी
दवा लेने जाने से डरता है,
क्योंकि सड़क नहीं,
केवल भरोसे का कच्चा रास्ता बचा है।

बच्चे स्कूल से पहले
कीचड़ पार करना सीख रहे हैं,
और नेता मंच से पहले
तालियां बटोर लियाँ
छोटी गाड़ियाँ अब “लक्ज़री” नहीं,
मजबूरी बन चुकी हैं।
किराया ऐसा कि
आदमी अस्पताल जाए या राशन लाए —
पहले हिसाब लगाता है।
फिर खबर आती है —
“केंद्र सरकार ने प्रोत्साहन राशि दी।”
वाह!
जिनकी सड़कें टूटी हैं,
उन्हें इनाम मिला है!
शायद अगली बार
पूरा पहाड़ बह जाए,
तो कोई मेडल भी मिल जाए —
“आपदा सहन शक्ति सम्मान”!
जनता सोचती है —
क्या व्यवस्था सचमुच अंधी है,
या दुख अब आंकड़ों में बदल चुका है?
क्योंकि यहाँ
फाइलें चल रही हैं,
पर सड़कें नहीं।
घोषणाएँ पहुँच रही हैं,
पर राहत नहीं।
और पहाड़ आज भी
चुपचाप खड़ा पूछ रहा है —
“मेरे लोगों का दर्द
किस विभाग में जमा करूँ?”
















