मुख्य संपादक (प्रमेश शर्मा की कलम से)
मां केवल एक शब्द नहीं, बल्कि त्याग, ममता, धैर्य, संघर्ष और असीम प्रेम का जीवंत स्वरूप है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति का पहला रिश्ता मां से जुड़ता है। जन्म से लेकर जीवन के हर कठिन मोड़ तक मां ही वह शक्ति होती है, जो बिना किसी स्वार्थ के अपने बच्चों के लिए हर परिस्थिति में खड़ी रहती है। इसी मातृत्व के सम्मान और उनके योगदान को स्मरण करने के लिए हर वर्ष मई महीने के दूसरे रविवार को “मदर्स डे” मनाया जाता है। इस वर्ष यह दिवस 10 मई 2026 को मनाया जा रहा है।
मदर्स डे की शुरुआत आधुनिक रूप में अमेरिका से मानी जाती है। वर्ष 1908 में अमेरिकी महिला एना जार्विस ने अपनी मां की स्मृति में इस दिन को मनाने की पहल की थी। उनकी मां सामाजिक कार्यों में सक्रिय थीं और महिलाओं के स्वास्थ्य तथा शांति के लिए कार्य करती थीं। एना जार्विस चाहती थीं कि समाज मां के त्याग और योगदान को सम्मानपूर्वक स्वीकार करे।
बाद में 1914 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को आधिकारिक रूप से मदर्स डे घोषित कर दिया। इसके बाद धीरे-धीरे यह परंपरा विश्वभर में फैल गई।
भारत में भी मदर्स डे पिछले कुछ वर्षों में व्यापक रूप से लोकप्रिय हुआ है। हालांकि भारतीय संस्कृति में मां को सदैव सर्वोच्च स्थान प्राप्त रहा है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है—
“मातृ देवो भव:”
अर्थात मां को देवता के समान सम्मान देना चाहिए।
भारतीय परिवार व्यवस्था में मां केवल बच्चों की देखभाल करने वाली महिला नहीं होती, बल्कि वह पूरे परिवार की धुरी मानी जाती है। गांव हो या शहर, मां परिवार की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक मजबूती का आधार होती है।
एक ग्रामीण महिला खेतों में काम करने के साथ घर संभालती है, पशुपालन करती है और बच्चों की परवरिश भी करती है। वहीं शहरी महिलाएं नौकरी और परिवार के बीच संतुलन बनाकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती हैं।
मां अपने बच्चों को केवल जन्म नहीं देती, बल्कि संस्कार, अनुशासन और जीवन जीने की सीख भी देती है। किसी भी समाज की नैतिक और सांस्कृतिक नींव मजबूत करने में माताओं की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
बदलते समय में मातृत्व की चुनौतियां
आधुनिक जीवनशैली और भागदौड़ भरे समय में माताओं की जिम्मेदारियां और चुनौतियां पहले से अधिक बढ़ गई हैं। संयुक्त परिवारों के टूटने से अब अधिकांश महिलाओं पर बच्चों की परवरिश और घर की जिम्मेदारी अकेले निभाने का दबाव बढ़ा है।
कामकाजी महिलाओं के सामने करियर और परिवार के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। वहीं डिजिटल युग में बच्चों की मानसिक और सामाजिक सुरक्षा भी माताओं के लिए चिंता का विषय बन रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज की मां केवल भावनात्मक आधार नहीं, बल्कि परिवार की “मल्टीटास्किंग मैनेजर” बन चुकी है। इसके बावजूद उनके कार्य को अक्सर औपचारिक मान्यता नहीं मिलती।
समाज में अक्सर मां को त्याग और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति मान लिया जाता है, लेकिन उनकी भावनाओं और मानसिक स्वास्थ्य पर कम चर्चा होती है। प्रसव के बाद महिलाओं में अवसाद, तनाव और मानसिक थकान जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
विशेषज्ञ कहते हैं कि परिवार और समाज को माताओं के मानसिक स्वास्थ्य, सम्मान और विश्राम पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए, जितना उनकी जिम्मेदारियों पर दिया जाता है।
केवल एक दिन नहीं, हर दिन सम्मान जरूरी
मदर्स डे केवल उपहार देने या सोशल मीडिया पोस्ट साझा करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। मां के प्रति सच्चा सम्मान उनके संघर्ष को समझने, उनकी भावनाओं की कद्र करने और जीवन में उन्हें समय देने में है।
आज के दौर में जब बुजुर्ग माताएं अकेलेपन का सामना कर रही हैं, तब यह दिन हमें परिवारिक मूल्यों और रिश्तों की अहमियत भी याद दिलाता है।
मां वह शक्ति है, जो बिना किसी अपेक्षा के अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी समर्पित कर देती है। उनका प्रेम निस्वार्थ, अटूट और अनमोल होता है। मदर्स डे हमें यह अवसर देता है कि हम अपनी मां के प्रति आभार व्यक्त करें और उनके योगदान को सम्मान दें।
सच तो यह है कि मां के सम्मान के लिए केवल एक दिन पर्याप्त नहीं हो सकता, क्योंकि मां का महत्व शब्दों में नहीं, बल्कि पूरे जीवन में महसूस किया जाता है।



















