फ्रंट पेज न्यूज़, मुख्य संपादक (प्रमेश शर्मा की कलम से)
मैं बंजार हूं…
हाँ वही बंजार,
जिसे तुम “नगर पंचायत” कहकर
फाइलों और भाषणों में सजाते हो।
उपमंडल का मुख्यालय हूं मैं,
प्राकृतिक सौंदर्य से लबालब,
पहाड़ों की गोद में बसा,
व्यापार का बड़ा केंद्र भी हूं।
हर रोज़ हजारों कदम
मेरी गलियों से गुजरते हैं,
कोई दफ्तर के काम से आता है,
कोई बाजार की आस में,
कोई सपनों की थैली लेकर,
तो कोई शिकायतों का पुलिंदा।
मुझे अच्छा लगता है
कि मेरी कुछ “कदर” है,
पर भीतर ही भीतर
एक कसक भी पलती है।
सोचता हूं…
क्या मैं सचमुच
उन सबको वो सुविधा दे पाता हूं
जिसके बड़े-बड़े वादे
हर चुनाव में किए जाते हैं?
मेरी नालियाँ आज भी
अपनी किस्मत पर रोती हैं,
सफाई का हाल ऐसा
कि झाड़ू भी मुझसे शर्माती है।

सार्वजनिक शौचालय
मानो चुनावी घोषणाओं के रिश्तेदार हों—
सिर्फ सुनाई देते हैं,
दिखते कहीं नहीं।
तीस साल से ऊपर का सफर हो गया,
नगर पंचायत कहलाते-कहलाते,
पर आज भी
कई मूलभूत सुविधाएं
मुझसे आंख-मिचौली खेलती हैं।
हर बार कुछ चेहरे आते हैं,
मुझे “आदर्श नगर” बनाने का सपना दिखाते हैं,
मेरे घावों पर
विकास का पोस्टर चिपकाते हैं।
प्रयास सबके रहते होंगे,
इरादे भी नेक ही होंगे,
पर मेरे हिस्से में अक्सर
सिर्फ आश्वासन ही आते हैं।
सड़कें पूछती हैं—
“हम कब संवरेंगे?”
नालियाँ कहती हैं—
“क्या हमारी भी कोई उम्र होती है?”
और जनता…
वो हर पांच साल बाद
फिर उम्मीद का दीप जला देती है।
अब 17 मई फिर आने वाली है,
फिर मेरे भाग्य का फैसला होगा,
फिर कुछ नए कर्णधार
मेरे उत्थान का जिम्मा संभालेंगे।
मुझे तब सच में अच्छा लगेगा,
जब मुझे संभालने वाले
सिर्फ कुर्सी के लिए नहीं,
मेरे विकास के लिए चुनकर आएंगे।
मैं बंजार हूं…
सुंदर तो बहुत हूं,
बस अब थोड़ा
“संवारा” जाना चाहता हूं।















