
फ्रंट पेज न्यूज़ (प्रमेश शर्मा)
5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी को याद दिलाने का अवसर है। हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखला नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, जल, जलवायु और जैव विविधता का आधार है। हिमालय को भारत की जल-टंकी कहा जाता है, क्योंकि यहां से निकलने वाली नदियां देश के विशाल भू-भाग को जीवन प्रदान करती हैं।
आज हिमालय जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित निर्माण, वनों की कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, मौसम चक्र में असामान्य परिवर्तन हो रहे हैं और प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। इसका सीधा प्रभाव पहाड़ी क्षेत्रों की आजीविका, कृषि, जल स्रोतों और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है।
हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पूर्वोत्तर राज्यों की पहचान हिमालय से है। यदि हिमालय का पर्यावरण संतुलन बिगड़ता है तो इसका प्रभाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश की जल एवं खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी।
विश्व पर्यावरण दिवस पर हमें संकल्प लेना होगा कि—
एक व्यक्ति, एक पौधा अवश्य लगाएंगे।
प्लास्टिक का उपयोग कम करेंगे।
जल स्रोतों और जंगलों की रक्षा करेंगे।
स्थानीय जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करेंगे।
पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली अपनाएंगे।
हिमालय हमें स्वच्छ जल, शुद्ध वायु और प्राकृतिक संपदा देता है। अब हमारी बारी है कि हम उसके संरक्षण में अपनी भूमिका निभाएं। आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और समृद्ध हिमालय सौंपना ही विश्व पर्यावरण दिवस का सबसे बड़ा संदेश है।
“हिमालय केवल पहाड़ नहीं, जीवन का आधार है।
हिमालय सुरक्षित रहेगा, तभी प्रकृति और मानवता का भविष्य सुरक्षित रहेगा।”
















