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हाईकोर्ट के फैसले से स्थानीय निकायों की सत्ता-समीकरण में बदलाव, अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनाव पर बढ़ी राजनीतिक हलचल।


शिमला/कुल्लू


हिमाचल प्रदेश में नगर परिषदों और नगर पंचायतों के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पदों के चुनाव को लेकर एक नई राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति उत्पन्न हो गई है।

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा विधायकों को स्थानीय निकायों के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष चुनाव में मतदान का अधिकार देने संबंधी राज्य सरकार के निर्णय पर अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद प्रदेश भर में कई स्थानीय निकायों के सत्ता समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।

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उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि नगर परिषद और नगर पंचायतों के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का चुनाव केवल निर्वाचित पार्षदों द्वारा किया जाएगा। ऐसे में अब उन स्थानों पर विशेष चर्चा शुरू हो गई है जहां किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं था और विधायक अथवा मंत्री के मत के सहारे अध्यक्ष या उपाध्यक्ष पद पर दावा मजबूत माना जा रहा था।


राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार प्रदेश के अनेक नगर निकायों में चुनाव परिणाम त्रिशंकु स्थिति में रहे हैं। कई स्थानों पर भाजपा और कांग्रेस समर्थित पार्षदों की संख्या लगभग बराबर है, जबकि कुछ जगहों पर निर्दलीय पार्षद ‘किंगमेकर’ की भूमिका में हैं। पहले सरकार द्वारा किए गए प्रावधान के अनुसार क्षेत्र के विधायक को भी मतदान का अधिकार प्राप्त था, जिससे सत्तारूढ़ दल को अतिरिक्त राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना मानी जा रही थी। अब न्यायालय की अंतरिम रोक के बाद यह लाभ समाप्त हो गया है।

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इस फैसले का सबसे अधिक प्रभाव उन नगर परिषदों और नगर पंचायतों में पड़ सकता है जहां अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के लिए संख्या बल बेहद कम अंतर से तय होना था। ऐसे निकायों में अब प्रत्येक निर्वाचित पार्षद का मत अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। राजनीतिक दलों ने भी अपने-अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ बैठकें तेज कर दी हैं और समर्थन जुटाने की कवायद शुरू हो गई है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायालय के इस आदेश ने स्थानीय स्वशासन की मूल भावना को बल दिया है। नगर परिषद और नगर पंचायत के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं, इसलिए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चयन का अधिकार भी उन्हीं निर्वाचित प्रतिनिधियों तक सीमित रहना चाहिए। दूसरी ओर सरकार के समर्थकों का तर्क है कि विधायक अपने क्षेत्र का व्यापक जनप्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए उन्हें भी इस प्रक्रिया में भागीदारी मिलनी चाहिए थी।


प्रदेश के कई क्षेत्रों में अब नई राजनीतिक परिस्थितियां बन सकती हैं। जिन निकायों में सत्ताधारी दल विधायक के मत के आधार पर अध्यक्ष पद हासिल करने की उम्मीद कर रहा था, वहां अब निर्दलीय और छोटे समूहों के पार्षदों का महत्व बढ़ गया है। वहीं विपक्षी दल इस निर्णय को लोकतांत्रिक व्यवस्था की जीत बताते हुए इसे स्थानीय निकायों की स्वायत्तता के लिए महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

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हिमाचल प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए नगर निकाय और पंचायत चुनावों के बाद अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पदों के गठन की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे समय में उच्च न्यायालय के इस आदेश ने राजनीतिक दलों की रणनीतियों को नया मोड़ दे दिया है। अंतिम निर्णय न्यायालय में मामले की आगामी सुनवाई के बाद स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल निर्वाचित पार्षद ही नगर परिषदों और नगर पंचायतों की सत्ता की दिशा तय करेंगे।

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