मौसमक्रिकेटईरान इस्राइल युद्धमेले और त्यौहारस्पोर्ट्सबॉलीवुडजॉब - एजुकेशनबिजनेसलाइफस्टाइलदेश-विदेशराशिफलआध्यात्मिक

जिभी में शेषनाग की तपोस्थली पर “साते जिभी” मेले का भव्य आगाज़।


फ्रंट पेज न्यूज़ (प्रमेश शर्मा) बंजार (कुल्लू)

हिमाचल प्रदेश के सुरम्य क्षेत्र के जिभी में स्थित भगवान शेषनाग की पावन तपोस्थली एक बार फिर आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति के संगम की साक्षी बनने जा रही है। यहां प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला प्रसिद्ध “साते जिभी मेला” इस वर्ष भी वैभव और श्रद्धा के साथ शुरू हो गया है।माना जाता है कि आदि काल में  भगवान शेषनाग इस स्थान पर विराजमान हुए, तब उन्होंने यहां दोनों ओर नदी प्रवाहित कर जीभ के आकार की भूमि का निर्माण किया, जिससे इस स्थान का नाम “जिभी” पड़ा। यह स्थल आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है।


वैसाखी पूर्व संध्या से शुरू होती है परंपरा
मेले की शुरुआत वैसाखी की पूर्व संध्या पर होती है, जब भगवान शेषनाग अपने मूल मंदिर में पूरे लाव-लश्कर और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनि के साथ विराजते हैं। इस अवसर पर दो कोठी की हारियान के साथ भव्य जागराता आयोजित किया जाता है, जिसमें श्रद्धालु रातभर भक्ति में लीन रहते हैं।


देव परंपराओं और सांस्कृतिक आयोजनों के प्रतीक के तौर में वैसाखी के दिन प्रातःकाल देव कार्यवाही संपन्न होती है, जिसके अंतर्गत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ ध्वजारोहण (पड्डयाई) भी कहा जाता है। इसके बाद माता बूढ़ी नागिन घयागी मेले का विधिवत शुभारंभ करती हैं।
मेले के दौरान प्रतिदिन विभिन्न देवी-देवता मंदिर में उपस्थित होकर देव कार्यवाही में भाग लेते हैं। इसके पश्चात पारंपरिक नाटी नृत्य का आयोजन होता है, जो स्थानीय संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है।


सातवें दिन विशाल मेला वैसाख मास की सातवीं प्रविष्टि को मेले का मुख्य आकर्षण देखने को मिलता है। इस दिन लक्ष्मी नारायण पझारी बाहु विशेष रूप से उपस्थित रहते हैं और महानाटी का आयोजन किया जाता है, जिसमें सैकड़ों लोग एक साथ पारंपरिक नृत्य में भाग लेते हैं।
इस वर्ष मेले की विशेषता यह है कि प्रभु श्रृंगा ऋषि लगभग 20 वर्षों के अंतराल के बाद इस मेले में विशेष रूप से विराजमान हो रहे हैं, जिससे श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखा जा रहा है।


लौऊल परंपरा के साथ मेले  का  समापन होता है जिसमें लक्ष्मी नारायण पझारी बाहू के हारियान का विशेष रस्म से मेले में एक अनूठी परंपरा “लौऊल” के साथ होता है, जिसमें श्रद्धालु एक विशाल मानव श्रृंखला बनाकर मंदिर क्षेत्र की सात बार परिक्रमा करते हैं। इसे लक्ष्मण रेखा का प्रतीक माना जाता है, जिसका उद्देश्य लोक कल्याण और रक्षा की कामना करना है।
देव परंपरा का अद्भुत प्रतीक “साते जिभी” भगवान शेषनाग की सप्त जिभाओं का प्रतीक मानी जाती है। यह मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यहां की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं को भी जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है।


गढपति देवता शेषनाग के करदार एवं खंड बंजार कारदार संघ के प्रधान सत्यदेव नेगी और अश्विनी नेगी ने बताया कि यह अनूठी देव परंपरा माता बूढ़ी नागिन, श्रृंगा ऋषि और लक्ष्मी नारायण पझारी बाहु के सानिध्य में आयोजित हो रही है, जिसका आज भव्य शुभारंभ हुआ है।
हर वर्ष की तरह इस बार भी दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शेषनाग का आशीर्वाद लेने के साथ-साथ हिमाचल की समृद्ध लोक संस्कृति का आनंद ले रहे हैं।

Leave a Reply

You cannot copy content of this page