मुख्य संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से।
“सड़क का सच और सजे हुए झूठ”
राष्ट्रीय राजमार्ग तीन सौ पाँच,
नाम बड़ा—पर हाल खरोच,
गड्ढों में सपने गिरते रोज,
विकास यहाँ बस भाषण रोज।
भाग्यपुर से आगे जो निकले,
किस्मत भी दो बार संभले,
सड़क नहीं—ये परीक्षा पथ है,
हर झटका जैसे शासन का कथ है।
पत्र लिखे, दरवाज़े खटखटाए,
नेताओं के चरण भी गिन आए,
फाइलें मोटी होती रहीं,
पर सड़क वहीं की वहीं सोती रहीं।
फिर खबर आई—“साहब आ रहे हैं!”
अचानक सब जाग रहे हैं,
गड्ढे भी शर्माकर छुपने लगे,
झूठ के फूल यहाँ खिलने लगे।
एक दिन में चमत्कार हुआ,
कीचड़ भी शृंगार हुआ,
जहाँ कल तक धूल उड़ती थी,
आज बोर्डों की सरकार हुआ।
“सावधान! सड़क खराब है”—
ये चेतावनी भी नवाब है,
सालों तक जो दिखा नहीं,
आज अचानक बेहिसाब है।
मिक्सिंग प्लांट भी भाग गया,
जैसे सच से डर कर जाग गया,
मशीनें बोलीं—“हम क्या करें?”
“दिखावा ही जब राग गया।”
रंग-रोगन से सजा दिया,
झूठ को सच बना दिया,
अधिकारियों की इस कला ने,
आईना भी शरमा दिया।
नेता जी आएंगे, देखेंगे,
फोटो खिंचाकर लेखेंगे—
पर जनता भी अब जान गई,
हर चाल तुम्हारी पहचान गई,
जो सड़क नहीं बना सके सालों में,
वो एक दिन में क्या जान गई?
ओ साहब! कभी बिना खबर के
इन गड्ढों में सच्चाई पाना,
तब समझोगे दर्द यहाँ का—
ये सड़क नहीं, जनता का अफसाना।
NH-305 की ये कहानी है,
जहाँ हकीकत भी मेहमान-सी और झूठ स्थायी रवानी है।

















