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हिमाचल राज्यसभा चुनाव: सस्पेंस की रणनीति, दिल्ली दरबार की बैठकों में उलझा नाम — 48 घंटे में खुलेंगे कांग्रेस के असली पत्ते

On: March 2, 2026 10:05 PM
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फ्रंट पेज न्यूज़ शिमला।

हिमाचल प्रदेश की सियासत एक बार फिर राज्यसभा चुनाव को लेकर असाधारण राजनीतिक हलचल के दौर से गुजर रही है। नामांकन प्रक्रिया शुरू होने में अब गिनती के दो दिन शेष हैं, लेकिन सत्तारूढ़ कांग्रेस अब तक अपने उम्मीदवार के नाम पर पूरी तरह मौन साधे हुए है। यही चुप्पी राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल बन गई है और सत्ता से लेकर संगठन तक हर स्तर पर गहन मंथन का संकेत दे रही है।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का हालिया दिल्ली दौरा इसी रणनीतिक खामोशी का अहम हिस्सा माना जा रहा है, जहां देर रात तक चली बैठकों में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ हिमाचल की इस एक सीट को लेकर गहराई से चर्चा हुई। इन बैठकों ने यह साफ कर दिया है कि इस बार पार्टी कोई भी कदम जल्दबाजी में नहीं उठाना चाहती।
दरअसल, कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक चुनाव नहीं बल्कि प्रतिष्ठा और राजनीतिक नियंत्रण की लड़ाई के रूप में देख रही है। यही वजह है कि उम्मीदवार के नाम पर जानबूझकर सस्पेंस बनाए रखने की रणनीति पर काम हो रहा है, ताकि विपक्ष को आखिरी क्षण तक तैयारी का अवसर न मिल सके। प्रदेश के अधिकांश विधायक इस पक्ष में बताए जा रहे हैं कि राज्यसभा में इस बार किसी मजबूत हिमाचली चेहरे को भेजा जाए, जिससे प्रदेश में संगठनात्मक संदेश भी जाए और स्थानीय संतुलन भी कायम रहे। दूसरी ओर हाईकमान राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को साधने के लिए किसी बड़े गैर-हिमाचली नेता को हिमाचल से राज्यसभा भेजने के विकल्प पर भी गंभीरता से विचार कर रहा है। यही खींचतान अंतिम घोषणा में हो रही देरी का सबसे बड़ा कारण बन गई है।
दावेदारों की सूची भी कम दिलचस्प नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा का नाम अनुभव और राष्ट्रीय पहचान के कारण चर्चा में है तो प्रतिभा सिंह को संगठन और जनाधार के संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री धनी राम शांडिल का नाम सामाजिक समीकरणों के संदर्भ में सामने आ रहा है, वहीं आईटी सलाहकार गोकुल बुटेल और एडवोकेट जनरल अनूप रतन को नए चेहरे के तौर पर परखा जा रहा है। गैर-हिमाचली विकल्पों में रजनी पाटिल और पवन खेड़ा के नामों की चर्चा यह संकेत दे रही है कि फैसला सिर्फ प्रदेश की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय रणनीति से जुड़ा हुआ है।
भाजपा भी पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए है। विधानसभा में स्पष्ट बहुमत कांग्रेस के पास होने के बावजूद विपक्ष किसी भी संभावित असंतोष या रणनीतिक गलती का इंतजार कर रहा है। यदि कांग्रेस गैर-हिमाचली उम्मीदवार उतारती है तो भाजपा चुनाव को रोचक बनाने के लिए मैदान में उतर सकती है। मौजूदा राज्यसभा सांसद इंदु गोस्वामी का कार्यकाल अप्रैल में समाप्त हो रहा है और उन्हें दोबारा मौका देने सहित कई नामों पर मंथन चल रहा है। पिछले राज्यसभा चुनाव में संख्याबल कम होने के बावजूद भाजपा ने जिस तरह राजनीतिक बाजी पलटी थी, उसने कांग्रेस को इस बार अतिरिक्त सतर्क बना दिया है।
निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार 5 मार्च तक नामांकन दाखिल किए जाएंगे और 16 मार्च को मतदान होगा, लेकिन असली राजनीतिक नब्ज आने वाले 48 घंटों में ही तय हो जाएगी। कांग्रेस की रणनीति साफ है — आखिरी क्षण तक सस्पेंस, अंदरखाने पूरी गणित और घोषणा के साथ मनोवैज्ञानिक बढ़त। अब हिमाचल की सियासत की निगाहें नामांकन के दिन पर टिक गई हैं, जब यह तय होगा कि राज्यसभा की यह सीट सिर्फ एक प्रतिनिधि चुनेगी या प्रदेश की राजनीति की नई दिशा भी तय करेगी।

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