40 मीटर-75 मीटर नियम पर सवाल — पहाड़ी हालात में “अव्यावहारिक” बताकर समीक्षा की मांग तेज।
फ्रंट पेज रिपोर्ट, कुल्लू/शिमला।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे निर्माण पर लगाए गए सख्त प्रतिबंधों ने हिमाचल प्रदेश में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। प्रदेश भर में सामाजिक कार्यकर्ताओं, व्यापारियों और स्थानीय लोगों ने इन नियमों को पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों के लिए अनुपयुक्त बताते हुए सरकार से तुरंत समीक्षा याचिका दायर करने की मांग की है।
कोर्ट के आदेश के अनुसार, हाईवे के दोनों ओर 40 मीटर के भीतर आवासीय और 75 मीटर के भीतर व्यावसायिक निर्माण पर रोक लगाई गई है। इसका उद्देश्य सड़क सुरक्षा को बढ़ाना है, लेकिन हिमाचल में इसे लागू करना बड़ी चुनौती बन गया है।
“पहाड़ों में 40 मीटर का मतलब खाई या चट्टान”
स्थानीय लोगों का कहना है कि हिमाचल में सड़कें खड़ी ढलानों और गहरी खाइयों के बीच से गुजरती हैं, जहां जमीन पहले से ही बेहद सीमित है। । ऐसे में 40 किलोमीटर पीछे हटाना संभव नहीं।

पूर्व सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर (सेवानिवृत्त) ने कहा कि यह “वन-साइज-फिट्स-ऑल” नीति मैदानी राज्यों के लिए तो ठीक हो सकती है, लेकिन हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य में यह भौगोलिक रूप से लागू ही नहीं हो सकती।

रोजगार पर संकट, छोटे कारोबारी सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
व्यापारियों का कहना है कि अगर नियम सख्ती से लागू हुए तो हजारों दुकानदार, ढाबा संचालक और छोटे कारोबारी प्रभावित होंगे। मंडी और कुल्लू क्षेत्रों के व्यापारियों ने साफ कहा कि यह आदेश उनकी आजीविका छीन सकता है।

सुरक्षा बनाम आजीविका — संतुलन की चुनौती के मध्य में विशेषज्ञ मानते हैं कि हाईवे किनारे अवैध अतिक्रमण रोकना जरूरी है, लेकिन इसके लिए क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार लचीली नीति होनी चाहिए। हिमाचल में “एक जैसा नियम” लागू करना व्यावहारिक नहीं है।
अब सबकी नजर राज्य सरकार पर है—क्या हिमाचल सरकार सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर करेगी?
या फिर पहाड़ी राज्यों के लिए अलग नीति बनाने की दिशा में कोई ठोस पहल होगी?
एक नजरिया से हम पहलू यही हो सकता है,“सुरक्षा जरूरी, पर पहाड़ों की सच्चाई भी समझनी होगी”



















