फ्रंट पेज न्यूज़, कल्लू/बंजार।
बंजार उपमंडल के बला स्थित प्राचीन मंदिर में मार्कंडेय ऋषि एवं माता त्रिपुरा बाला सुंदरी के पावन सानिध्य में 10 प्रविष्टे बैसाख के अवसर पर आयोजित होने वाला पारंपरिक “झीहरू”पर्व श्रद्धा, संस्कृति और लोक-रोमांच का अद्भुत संगम है। यह 10 दिवसीय आयोजन क्षेत्र की समृद्ध देव परंपरा और सामुदायिक सहभागिता का जीवंत उदाहरण है।
पर्व की शुरुआत बैसाख संक्रांति की पूर्व संध्या पर आयोजित “हुम” पर्व से होती है। इसके बाद संक्रांति से लेकर नौ दिनों तक “विर्शी जांच” परंपरा के तहत प्रतिदिन देव रथ मंदिर में विराजमान होते हैं। इस दौरान क्षेत्र के सभी हारियान (ग्रामवासी) बड़ी श्रद्धा के साथ भाग लेते हैं।

इन नौ दिनों में प्रतिदिन दिन के समय “ठहरूं” नामक पारंपरिक खेल खेला जाता है, जिसमें स्थानीय लोग उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। वहीं, रात्रि के समय में भजन-कीर्तन का आयोजन होता है, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहता है।
झीहरू पर्व: रोमांच और परंपरा का संगम है यह दसवें दिन मनाया जाने वाला “झीहरू” पर्व इस आयोजन का मुख्य आकर्षण होता है। यह एक विशेष प्रकार का पारंपरिक खेल है, जो निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार खेला जाता है। इसमें गांव के प्रत्येक चिन्हित परिवार से एक सदस्य भाग लेता है, जिससे यह आयोजन सामूहिक एकता का प्रतीक बन जाता है।
इस रस्म में प्रतिभागियों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। एक वर्ग आगे की ओर दौड़ता है, जबकि दूसरा वर्ग विपरीत दिशा से दौड़ते हुए उनके सिर पर पहनी टोपी को उतारने का प्रयास करता है। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा और रोमांच देखने को मिलता है, जो दर्शकों को भी रोमांचित कर देता है।
देव मिलन की अनूठी रस्म के साथ
इस पर्व की विशेषता केवल खेल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें देव परंपरा की गहरी झलक भी देखने को मिलती है। “झीहरू” के दौरान मार्कंडेय ऋषि और माता त्रिपुरा बाला सुंदरी के देवलू दो अलग-अलग पक्षों में विभाजित होकर इस रस्म को निभाते हैं।
एक ओर से माता का रथ और दूसरी ओर से ऋषि का रथ आगे बढ़ता है। दोनों के मिलन के बाद यह प्रतिस्पर्धा होती है कि कौन पहले अपने निर्धारित स्थान तक पहुंचता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत आकर्षक और आस्था से परिपूर्ण होता है।
पूरे 10 दिनों तक बाला क्षेत्र देवमय वातावरण में डूबा रहता है। दूर-दराज से श्रद्धालु इस पर्व में भाग लेने पहुंचते हैं। पारंपरिक रीति-रिवाज, लोक खेल, भजन-कीर्तन और देव आस्था का यह संगम क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, परंपरा और लोकसंस्कृति का भी अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।














