1992 में आई थी बड़ी शान से,
कागज़ों में सपनों की उड़ान से। कहा गया—“अब बदलेगा दौर”,
पर हाल वही—पुराना सा शोर।
शुरू में खूब हुआ था विरोध,
फिर भी लागू हुआ बिना किसी सोच।
सरकार बोली—“ये है विकास”,
जनता सोचती रह गई—“कहाँ है आस?”
साल दर साल गुज़रते गए,
वायदे कागज़ों में ही सिमटते गए।

मुकाम की बातें बहुत हुईं,
पर मंज़िल कहीं दिखी ही नहीं।
सरकारी ज़मीनें आज भी बेगानी,
नगर पंचायत की किस्मत अधूरी कहानी।
नामांतरण का सपना अधूरा पड़ा,
फाइलों में ही हर निर्णय अटका पड़ा।
न अपने संसाधन, न अपनी कमाई,
बस उम्मीदों की ही चलती रलाई।

स्थायी आय का कोई ठिकाना नहीं,
खर्च करने को भी खज़ाना नहीं।
स्थानीय निकाय का दर्जा तो मिला,
पर सुविधाओं का सूरज ना खिला।
प्रबंधन ऐसा—जैसे नाव बिना पतवार,
चलती है बस हवा के आधार।
जनता पूछे—“क्या यही आज़ादी है?”,
या सिर्फ कागज़ों की बुनियादी कहानी है?
हर बार बदलते हैं चेहरे यहाँ,
पर हालत वही—जैसे ठहरे जहाँ।
व्यंग्य यही है इस कहानी का सार,
नगर पंचायत बनी, पर बेबस सरकार।
नाम बड़ा, दर्शन छोटे रहे,
सपने हर बार अधूरे ही सोते रहे।














