संपादकीय।
हिमाचल प्रदेश आज देश के प्रमुख पर्यटन राज्यों में गिना जाता है। बर्फ से ढकी चोटियाँ, शांत घाटियाँ और प्राकृतिक सौंदर्य हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। सरकारें इसे “पर्यटन की राजधानी” बनाने का लक्ष्य लेकर बड़े निवेश और प्रचार अभियान चला रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या पहाड़ की भौगोलिक और पर्यावरणीय क्षमता इस तेज़ रफ्तार पर्यटन को झेलने के लिए तैयार है? विकास की चमक के पीछे बुनियादी ढांचे की सच्चाई अक्सर छिप जाती है।

सड़कें और यातायात का संकट
Shimla, Manali, Dharamshala और Kasauli जैसे शहर पर्यटन के केंद्र बन चुके हैं, लेकिन इनकी सड़कें दशकों पुरानी क्षमता पर ही टिकी हुई हैं। सीजन के दौरान घंटों जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और संकरी सड़कों पर वाहनों का दबाव आम बात है। पहाड़ों में असीमित चौड़ीकरण संभव नहीं, इसलिए कैरीइंग कैपेसिटी तय किए बिना पर्यटन बढ़ाना अव्यवस्था को न्योता देना है।

जल संकट और संसाधनों पर दबाव
पर्यटन के विस्तार के साथ होटल और होमस्टे की संख्या तेज़ी से बढ़ी है, लेकिन जल स्रोतों का संरक्षण उसी अनुपात में नहीं हुआ। गर्मियों में पानी की कमी गंभीर समस्या बन जाती है, खासकर Shimla जैसे शहरों में। स्थानीय लोगों और पर्यटकों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। जलाशयों के रखरखाव, वर्षा जल संचयन और जल उपयोग के स्पष्ट नियमों के बिना यह संकट भविष्य में और गहरा सकता है।
प्राकृतिक अभ्यारण और पर्यावरण संरक्षण
हिमाचल की असली पहचान उसके वन, अभ्यारण और जैव विविधता हैं। Great Himalayan National Park जैसे संरक्षित क्षेत्र यह दिखाते हैं कि संरक्षण और पर्यटन साथ-साथ चल सकते हैं। लेकिन अनियंत्रित ट्रेकिंग, प्लास्टिक कचरा और अवैज्ञानिक निर्माण पहाड़ी पारिस्थितिकी के लिए खतरा बन रहे हैं। इको-टूरिज्म को केवल नारे से आगे बढ़ाकर सख्त नियमों और निगरानी के साथ लागू करना होगा।
स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन की चुनौती
भूस्खलन, बर्फबारी और बादल फटना हिमालयी क्षेत्रों की वास्तविकता हैं। इसके बावजूद पर्यटन क्षेत्रों में पर्याप्त ट्रॉमा सेंटर, विशेषज्ञ डॉक्टर और आपदा के समय वैकल्पिक मार्गों की कमी चिंताजनक है। यदि लाखों पर्यटकों को आमंत्रित किया जा रहा है, तो उनकी सुरक्षा और आपातकालीन सेवाओं की मजबूत व्यवस्था भी समान रूप से आवश्यक है।
स्थानीय समाज पर प्रभाव
पर्यटन से रोजगार और आय के अवसर बढ़े हैं, लेकिन इसके साथ सामाजिक दबाव भी बढ़ा है। जमीन और किराए की कीमतों में वृद्धि, कचरा प्रबंधन की समस्या और सांस्कृतिक पहचान का क्षरण स्थानीय समाज को प्रभावित कर रहा है। यदि स्थानीय समुदाय असंतुष्ट रहेगा, तो पर्यटन का मॉडल दीर्घकालिक नहीं रह पाएगा।
संतुलित और सस्टेनेबल समाधान
हिमाचल को अब संख्या आधारित पर्यटन से आगे बढ़कर गुणवत्ता आधारित मॉडल अपनाना होगा। कैरीइंग कैपेसिटी का निर्धारण, मल्टी-लेवल पार्किंग, सार्वजनिक परिवहन का विस्तार, जल स्रोतों का संरक्षण, कचरा प्रबंधन की सख्त व्यवस्था और नए पर्यटन स्थलों का वैज्ञानिक विकास—ये सभी कदम अनिवार्य हैं।
निष्कर्ष: विकास का विवेकपूर्ण मार्ग
हिमाचल प्रदेश को केवल ‘पर्यटन की राजधानी’ का तमगा नहीं चाहिए, बल्कि एक संतुलित और सुरक्षित पर्यटन मॉडल की आवश्यकता है। यदि योजना, अनुशासन और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो अनियंत्रित भीड़ और अव्यवस्था पहाड़ की असली पहचान को नुकसान पहुँचा सकती है। विकास तभी सार्थक होगा जब प्रकृति, पर्यटक और स्थानीय समाज—तीनों के हितों में संतुलन स्थापित किया































