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लोकसभा में सरकार के उत्तर से अध्यापकों में चिंता,TET को लेकर सुप्रीम कोर्ट आदेश की गलत व्याख्या से अन्याय की आशंका: कर्मचारी महासंघ


फ्रंट पेज न्यूज़ नई दिल्ली/शिमला।
लोकसभा में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए एक लिखित उत्तर और सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश को लेकर देशभर के अध्यापकों, विशेषकर हिमाचल प्रदेश के शिक्षकों में गहरी चिंता पैदा हो गई है। हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ (राष्ट्रीय राज्य कर्मचारी महासंघ से संबद्ध) ने चेतावनी दी है कि यदि इन दोनों तथ्यों को समग्र और संतुलित दृष्टि से नहीं समझा गया, तो लाखों शिक्षकों के साथ गंभीर अन्याय हो सकता है।
महासंघ का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने

Anjuman Ishrat बनाम State of Maharashtra (निर्णय दिनांक 1 सितंबर 2025) मामले में यह अवश्य कहा है कि शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) न्यूनतम योग्यता के रूप में आवश्यक है, लेकिन इस निर्णय को पूर्व प्रभाव (retrospective effect) से लागू नहीं किया जा सकता। खासतौर पर उन अध्यापकों पर नहीं, जिनकी नियुक्ति TET लागू होने से पहले, तत्कालीन नियमों के तहत विधिवत हुई थी।
लोकसभा में सरकार का उत्तर भी यही कहता है
महासंघ ने ध्यान दिलाया कि लोकसभा में अतारांकित प्रश्न संख्या 1606 के उत्तर में केंद्र सरकार स्वयं यह स्वीकार कर चुकी है कि वर्ष 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों की नियुक्तियां उस समय लागू नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार हुई थीं, जब TET अनिवार्य नहीं था।
इसके बावजूद यदि अब इन शिक्षकों पर TET की शर्त थोपी जाती है, तो यह
सरकार के अपने संसदीय उत्तर के विपरीत होगा,
और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन माना जाएगा।
हजारों अनुभवी शिक्षक असमंजस में
हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष नरेश ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में ऐसे हजारों शिक्षक कार्यरत हैं, जिन्होंने 20–30 वर्षों से अधिक समय तक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया है।
उन्होंने कहा,
“इन शिक्षकों को आज पदोन्नति, सेवा सुरक्षा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता में डालना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि शिक्षा तंत्र के साथ भी अन्याय है। जिन शिक्षकों ने पीढ़ियों को शिक्षित किया, उन्हें आज नियमों की गलत व्याख्या का शिकार बनाया जा रहा है।”
शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा सीधा असर
महासंघ ने आगाह किया है कि यदि इस संवेदनशील विषय पर शीघ्र और स्पष्ट नीति नहीं बनाई गई, तो शिक्षकों का मनोबल टूटेगा, जिसका सीधा असर विद्यालयों की कार्यप्रणाली और छात्रों की शिक्षा पर पड़ेगा। यह स्थिति न तो राज्यों के हित में है और न ही राष्ट्र के।
महासंघ की प्रमुख मांग
हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ ने केंद्र सरकार से स्पष्ट मांग की है कि—
Right to Education Act 2009 की अधिसूचना से पूर्व नियुक्त अध्यापकों को TET से विधिक रूप से स्पष्ट छूट देने हेतु
लोकसभा में विधेयक लाकर स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट किया जाए,
ताकि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित रह सके और अनावश्यक विवाद समाप्त हो।
महासंघ का कहना है कि कानून का उद्देश्य व्यवस्था सुधारना होता है, न कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को असुरक्षा में धकेलना।

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