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हिमाचल में लॉटरी की वापसी: तात्कालिक राजस्व का आकर्षण या सामाजिक संतुलन की बड़ी परीक्षा?

On: February 20, 2026 1:49 PM
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संपादकीय।
हिमाचल प्रदेश में लॉटरी को दोबारा शुरू करने की संभावनाओं पर चल रही चर्चा केवल एक आर्थिक निर्णय का विषय नहीं है, बल्कि यह शासन की प्राथमिकताओं, सामाजिक उत्तरदायित्व और विकास की दिशा को तय करने वाला संवेदनशील नीतिगत मोड़ बन चुकी है। वर्ष 1999 में जिस व्यवस्था पर सामाजिक कारणों से रोक लगाई गई थी, आज वही विकल्प वित्तीय दबावों से जूझ रही राज्य सरकार के लिए संभावित राजस्व स्रोत के रूप में सामने खड़ा है। कैबिनेट सब–कमेटी का गठन इस बात का संकेत है कि सरकार इस विकल्प को गंभीरता से परख रही है, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या लॉटरी वास्तव में राज्य की अर्थव्यवस्था को स्थिर आधार दे सकती है या यह केवल अल्पकालिक वित्तीय राहत का साधन भर साबित होगी।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो अनुमानित 100 से 150 करोड़ रुपये वार्षिक आय का आंकड़ा पहली नजर में आकर्षक प्रतीत होता है, विशेषकर तब जब राज्य राजस्व घाटे और बढ़ते व्यय के दबाव से गुजर रहा हो। केरल और पंजाब जैसे राज्यों के उदाहरण इस मॉडल को व्यावहारिक सिद्ध करते हैं, परंतु हिमाचल की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक संरचना भिन्न है। टिकट बिक्री पर आधारित आय स्वभाव से अस्थिर होती है और प्रशासनिक लागत, तकनीकी ढांचा, वितरण प्रणाली तथा निगरानी पर होने वाला खर्च घटाने के बाद वास्तविक शुद्ध आय कितनी बचेगी—यह गंभीर विश्लेषण का विषय है। यदि यह आय राज्य के कुल वित्तीय घाटे का केवल सीमित हिस्सा ही पूरा कर पाए, तो इसे संरचनात्मक आर्थिक सुधार नहीं बल्कि तात्कालिक राजकोषीय सहारा ही माना जाएगा।
इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष सामाजिक–आर्थिक प्रभाव है। लॉटरी को अर्थशास्त्री अक्सर “प्रतिगामी कर” की श्रेणी में रखते हैं, क्योंकि इसमें भागीदारी मुख्यतः निम्न और मध्यम आय वर्ग से आती है। सीमित आय वाले परिवार बेहतर जीवन की आशा में बार-बार टिकट खरीदते हैं और यह खर्च प्रायः शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से कटौती कर के किया जाता है। व्यवहारिक अर्थशास्त्र बताता है कि कम संभावना के बावजूद बड़े पुरस्कार का आकर्षण मानव मनोविज्ञान को बार-बार निवेश करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे दीर्घकाल में वित्तीय अनुशासन कमजोर होता है और सामाजिक विषमता बढ़ने का खतरा रहता है।
लॉटरी की वैधानिकता इसे जुए से अलग अवश्य करती है, परंतु जब राज्य स्वयं इसे संचालित करता है तो यह जोखिमपूर्ण आर्थिक व्यवहार को सामाजिक स्वीकृति भी देता है। युवाओं में त्वरित लाभ की मानसिकता को बढ़ावा मिलने और भविष्य में ऑनलाइन सट्टेबाजी जैसे अनियंत्रित क्षेत्रों के विस्तार का खतरा भी इससे जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही पारदर्शिता सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी, क्योंकि टिकट वितरण से लेकर ड्रॉ प्रक्रिया और पुरस्कार भुगतान तक किसी भी स्तर पर उठने वाला संदेह सरकार की विश्वसनीयता को सीधे प्रभावित करेगा। देश के कई राज्यों में पहले इस प्रकार की शिकायतें सामने आ चुकी हैं, जो इस आशंका को और गंभीर बनाती हैं।
यदि राज्य का वास्तविक उद्देश्य राजस्व को मजबूत करना है, तो दीर्घकालिक और सामाजिक रूप से सशक्त विकल्प भी मौजूद हैं। हिमाचल में ईको–टूरिज्म, वेलनेस टूरिज्म और एडवेंचर स्पोर्ट्स के विस्तार से स्थायी आय के स्रोत विकसित किए जा सकते हैं। ऑर्गेनिक कृषि, सेब, शहद और औषधीय पौधों की अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग राज्य की पहचान को वैश्विक बाजार से जोड़ सकती है। डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्टार्टअप इकोसिस्टम के माध्यम से युवाओं को रोजगार देने के साथ कर–आधार भी बढ़ाया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण राजस्व प्रशासन में सुधार है, जहां टैक्स संग्रहण की पारदर्शिता और रिसाव पर नियंत्रण दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता प्रदान कर सकता है।
फिर भी यदि सरकार लॉटरी को लागू करने का निर्णय लेती है, तो इसे केवल आय अर्जित करने का साधन नहीं बल्कि एक सख्त नियामक ढांचे के साथ सामाजिक दायित्व से जोड़ना होगा। आय का निश्चित हिस्सा नशामुक्ति, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर अनिवार्य रूप से खर्च करना, टिकट खरीद की सीमा तय करना, डिजिटल पारदर्शिता सुनिश्चित करना और व्यापक जन–परामर्श के साथ सामाजिक प्रभाव आकलन कराना अनिवार्य होना चाहिए।
अंततः हिमाचल में लॉटरी की वापसी का प्रश्न राजकोषीय गणित से कहीं बड़ा है। यह तय करेगा कि राज्य तात्कालिक आय के लिए किस हद तक सामाजिक जोखिम उठाने को तैयार है और क्या वह दीर्घकालिक, टिकाऊ और समावेशी आर्थिक मॉडल की दिशा में ठोस कदम बढ़ाना चाहता है। आवश्यकता इस बात की है कि निर्णय जल्दबाजी या वित्तीय दबाव में नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक विश्लेषण, सामाजिक संवाद और दूरदर्शी नीति–दृष्टि के आधार पर लिया जाए, ताकि राजस्व भी बढ़े और समाज की बुनियाद भी मजबूत रहे।

मुख्य संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से

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