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वन बचेंगे, पर इंसाफ के साथ,अतिक्रमण हटाने के नाम पर मनमानी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

On: February 11, 2026 8:45 AM
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फ्रंट पेज न्यूज़ नई दिल्ली/शिमला/गुवाहाटी।


देवभूमि हिमाचल से लेकर नॉर्थ-ईस्ट के संवेदनशील वन क्षेत्रों तक गूंज रखने वाला एक अहम फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वन भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश मनमानी कार्रवाई की अनुमति नहीं देता। शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान पर्यावरण संरक्षण और कानून के शासन के बीच किसी टकराव को स्वीकार नहीं करता—दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वन केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि जलवायु संतुलन, जल स्रोतों, जैव विविधता और पहाड़ी पारिस्थितिकी की जीवनरेखा हैं। अदालत ने माना कि वन भूमि पर बढ़ता अतिक्रमण देशभर में—खासतौर पर हिमालयी और नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में—पर्यावरणीय संकट को और गहरा कर रहा है।
हिमाचल और नॉर्थ-ईस्ट के लिए क्यों अहम
अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन, भू-क्षरण और जल स्रोतों के सूखने जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं, वहीं नॉर्थ-ईस्ट में आरक्षित वनों के भीतर लंबे समय से बसे मानव निवास प्रशासन और पर्यावरण के बीच जटिल चुनौती बने हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि वन संरक्षण जरूरी है, लेकिन बिना सुनवाई, बिना जांच और बिना कानूनी प्रक्रिया के बेदखली स्वीकार्य नहीं।
असम के आरक्षित वनों का मामला
यह फैसला असम के डोयांग, साउथ नाम्बर, जमुना मडुंगा, बरपानी, लुटुमाई और गोलाघाट जैसे आरक्षित वनों से जुड़े मामलों में आया है, जहां ग्रामीणों ने 70 वर्षों से अधिक समय से निवास का दावा किया है।
राज्य सरकार का कहना है कि असम में करीब 3.62 लाख हेक्टेयर वन भूमि पर अतिक्रमण है और लगभग 20 प्रतिशत वन क्षेत्र प्रभावित हो चुका है।
समिति करेगी फैसला, जल्दबाज़ी पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार की उस कार्ययोजना को मंजूरी दी, जिसके तहत—
वन और राजस्व अधिकारियों की संयुक्त समिति गठित होगी
हर मामले में दस्तावेज़ों और दावों की जांच होगी
अधिकार सिद्ध न होने पर ही कारणयुक्त आदेश जारी होगा
संबंधित व्यक्ति को 15 दिन का नोटिस दिया जाएगा
तब तक यथास्थिति बनाए रखी जाएगी
देवभूमि के लिए संदेश
शीर्ष अदालत का यह फैसला हिमाचल और नॉर्थ-ईस्ट जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील राज्यों के लिए संतुलन का मार्ग दिखाता है—
वनों की रक्षा भी हो, और वर्षों से बसे लोगों के साथ न्याय भी।
यही संवैधानिक सोच देवभूमि की आत्मा और पूर्वोत्तर की सामाजिक संरचना—दोनों से मेल खाती है।

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