फ्रंट पेज न्यूज़, शिमला।
15 अप्रैल को रिकांगपियो किन्नौर में मनाये गये हिमाचल दिवस पर वित्तीय देनदारियों की घोषणा न करके मुख्यमंत्री ने एक फ़िर कर्मचारियों और पेंशनरों को निराश किया है।

यह बात हिमाचल प्रदेश पेंशनभोगी संघ के प्रदेशाध्यक्ष एल०आर० गुलशन ने यहां जारी एक प्रैस वक्तव्य में कही। उन्होंने कहा कि विगत दिनों मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने उनसे मिलने गये विभिन्न पेंशनर संगठन के नेताओं को दस दिन के भीतर बुलाकर उनकी वित्तीय देनदारियों के शीघ्र भुगतान का आश्वासन दिया था। लेकिन एक महीना बीत जाने के बाद भी मुख्यमंत्री ने न तो पेंशनर नेताओं को चर्चा के लिये बुलाया और न ही हिमाचल दिवस पर उनकी वित्तीय देनदारियों के भुगतान को लेकर कोई घोषणा की।

प्रदेश उपाध्यक्ष खुशहाल चंद नेगी,एसपी सागर, सुरेश कुमार शर्मा, प्रदेश उपाध्यक्ष (महिला विंग) लीला डोगरा, चिंतपूर्णा शर्मा, संगठन सचिव मनोरमा डोगरा, जिला कुल्लू पेंशनभोगी संघ के अध्यक्ष दयाल सिंह ठाकुर,शहरी कुल्लू इकाई के अध्यक्ष तेज सिंह ठाकुर, भुंतर खण्ड के अध्यक्ष ओंकार दत्त शर्मा, मनाली खण्ड के अध्यक्ष नील चंद, बंजार खंड के अध्यक्ष नारायण सिंह चौहान सहित अनेक पेंशनर नेताओं ने कहा कि अब तो पेंशनर भी अपनी वित्तीय देनदारियों को मांगती बार शर्मिंदा हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश की सुक्खू सरकार को सत्ता में आये करीब चार साल हो गये हैं। लेकिन पेंशनरों की जायज़ वित्तीय देनदारियों का अभी तक भुगतान नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि इस बार पेंशनरों को पूरी आस थी कि मुख्यमंत्री महंगाई भत्ते की 13 प्रतिशत किस्त सहित संशोधित वेतनमान के एरियर के भुगतान को लेकर कोई बड़ी घोषणा करेंगे। लेकिन इस बार भी कुछ नहीं दिया।

संघ के प्रदेशाध्यक्ष एल०आर० गुलशन ने कहा कि मुख्यमंत्री ने एक महीने के अंदर “यू टर्न” लेकर वेतन कटौती को बहाल करके केवल अफसरशाही को ही खुश किया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार वित्तीय देनदारियों को अनावश्यक रूप से टाल कर पेंशनरों और कर्मचारियों में अपनी विश्वसनीयता खो रही है। जिसका असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में निश्चित रूप से दिखने वाला है।

हिमाचल प्रदेश पेंशनभोगी संघ केप्रदेशाध्यक्ष एल०आर० गुलशन ने कहा कि संयुक्त संघर्ष समिति और पेंशनर फ्रंट के अगुवा बने नेता पेंशनरों की वित्तीय मांगों को राज्य सरकार से मनवाने में पूरी तरह विफ़ल रहे हैं। इसलिये उन्हें नैतिकता के आधार पर तुरंत पद से त्यागपत्र दे देना चाहिये। ऐसे निकम्मे पेंशनर नेताओं का पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है।















