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आर्थिक संकट के बीच एपीएमसी में लग्ज़री गाड़ियों की खरीद पर सवाल

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फ्रंट पेज न्यूज़ शिमला।
“150 करोड़ की MIS राशि अटकी, और बोर्ड कर रहा करोड़ों का खर्च” — सुशील कदशोली

प्रदेश की डांवाडोल आर्थिक स्थिति के बीच एपीएमसी चेयरमैन और अधिकारियों के लिए लग्ज़री गाड़ियों की खरीद का प्रस्ताव अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया है।

भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश महामंत्री सुशील कदशोली ने इसे “जनभावनाओं के विपरीत और निंदनीय” करार देते हुए सरकार पर किसानों-बागवानों की अनदेखी का आरोप लगाया है।
कदशोली ने जारी बयान में कहा कि जब प्रदेश के हजारों बागवान मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (MIS) के तहत अपने बकाया भुगतान का इंतजार कर रहे हैं, तब मार्केटिंग बोर्ड द्वारा करोड़ों रुपये की लग्ज़री गाड़ियों की खरीद का निर्णय अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के बागवानों की लगभग 150 करोड़ रुपये की राशि आज भी MIS के तहत लंबित है, जो उनकी मेहनत की कमाई है।
बागवानों की चिंता: सीजन की तैयारी पर संकट
उन्होंने कहा कि सेब और अन्य फसलों पर निर्भर हजारों परिवारों को खाद, दवाइयों, स्प्रे ऑयल और आगामी सीजन की तैयारियों के लिए तत्काल नकदी की आवश्यकता है। भुगतान में देरी के कारण बागवान आर्थिक दबाव में हैं और कई क्षेत्रों में उधारी पर निर्भर होकर खेती की तैयारियां कर रहे हैं।
कदशोली ने कहा कि सरकार को प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए—पहले किसान और बागवान, बाद में सुविधाएं। ऐसे समय में विलासितापूर्ण खर्च यह संदेश देता है कि प्रशासनिक सुविधा को जनहित से ऊपर रखा जा रहा है।
उठाई गई प्रमुख मांगें
भाजयुमो की ओर से सरकार के सामने तीन स्पष्ट मांगें रखी गई हैं—
MIS के अंतर्गत बागवानों की समस्त बकाया राशि का शीघ्र भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
अनावश्यक और विलासितापूर्ण खर्चों पर तत्काल रोक लगाई जाए।
किसान एवं बागवान हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
“किसान ही अर्थव्यवस्था की रीढ़”
कदशोली ने कहा कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार किसान और बागवान हैं। यदि उनकी समस्याओं को नजरअंदाज किया गया तो इसका व्यापक असर पूरे प्रदेश की आर्थिक संरचना पर पड़ेगा। उन्होंने सरकार से संवेदनशीलता दिखाते हुए त्वरित और व्यावहारिक निर्णय लेने की अपील की।
वर्तमान परिदृश्य में यह मुद्दा केवल वाहनों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार की प्राथमिकताओं और वित्तीय अनुशासन पर भी सवाल खड़ा करता है। आर्थिक संकट के दौर में पारदर्शिता और जवाबदेही ही विश्वास बहाल कर सकती है।

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