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कैंसर के ख़िलाफ़ जंग: अब टालने का नहीं, ठोस निर्णय का समय

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फ्रंट पेज न्यूज डेस्क।
कैंसर अब केवल एक बीमारी नहीं रहा, यह भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, सामाजिक चेतना और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कठोर परीक्षा बन चुका है। हर वर्ष लाखों भारतीय कैंसर की चपेट में आते हैं, लेकिन त्रासदी यह है कि बड़ी संख्या में लोग इलाज शुरू होने से पहले ही हार मान लेते हैं। यह हार चिकित्सा विज्ञान की नहीं, बल्कि हमारी नीतिगत प्राथमिकताओं, संसाधन वितरण और सामाजिक सोच की है।
विश्व कैंसर दिवस पर असली सवाल यह नहीं है कि कैंसर कितना घातक है—बल्कि यह है कि हम अब भी समय रहते क्यों नहीं जाग पा रहे हैं। भारत में अधिकांश कैंसर के मामले तीसरे या चौथे चरण में सामने आते हैं, जब इलाज न केवल अत्यधिक महँगा हो जाता है, बल्कि उसकी सफलता की संभावना भी सीमित रह जाती है। इसके पीछे साफ़ वजहें हैं—ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में जाँच सुविधाओं का अभाव, आर्थिक असमानता, और बीमारी को लेकर गहराई तक बैठा डर व भ्रम।
कैंसर पर बनी सामाजिक चुप्पी आज एक तरह का अपराध बन चुकी है। आज भी बड़ी आबादी कैंसर को जीवन का ‘अंत’ मान लेती है, जबकि सच्चाई यह है कि समय पर पहचान और उपचार से कई प्रकार के कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकते हैं। विशेषकर स्तन, गर्भाशय ग्रीवा, मुख और फेफड़ों के कैंसर ऐसे हैं, जिनमें शुरुआती जाँच जीवन और मृत्यु के बीच फ़र्क़ तय कर सकती है। इसके बावजूद नियमित स्क्रीनिंग को आज भी विलासिता की तरह देखा जाता है, अधिकार की तरह नहीं।
सरकार की ओर से आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ निश्चित रूप से सकारात्मक पहल हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, आधुनिक उपकरणों का अभाव और लंबी प्रतीक्षा सूची आम नागरिक को हतोत्साहित करती है। तंबाकू नियंत्रण से जुड़े क़ानून मौजूद हैं, पर उनका प्रभावी क्रियान्वयन ढीला है—जबकि यह निर्विवाद तथ्य है कि तंबाकू कैंसर का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। जब नशा सुलभ और चेतावनी औपचारिक हो जाए, तो बीमारी का फैलाव रोकना केवल काग़ज़ी कोशिश बनकर रह जाता है।
अब ज़रूरत है कि कैंसर को स्वास्थ्य बजट, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाया जाए। यह सिर्फ़ स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं है। शिक्षा मंत्रालय को जागरूकता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा, महिला एवं बाल विकास विभाग को स्क्रीनिंग और पोषण पर ज़ोर देना होगा, ग्रामीण विकास मंत्रालय को बुनियादी जाँच सुविधाएँ सुनिश्चित करनी होंगी और सूचना तंत्र को डर नहीं, तथ्य और भरोसा फैलाना होगा।
विश्व कैंसर दिवस महज़ प्रतीकात्मक आयोजनों और भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह दिन नीतिगत संकल्प, सामाजिक संवेदनशीलता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी की पुनः पुष्टि का अवसर है। कैंसर के ख़िलाफ़ लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं जीती जाती—यह जागरूक समाज, सजग नागरिक और सक्रिय, जवाबदेह सरकार से जीती जाती है।
अब समय आ गया है कि कैंसर को डर नहीं, एक चुनौती के रूप में देखा जाए—
और इस चुनौती का सामना आधे मन से नहीं, बल्कि तथ्यों, साहस और ठोस कार्रवाई से किया जाए।

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