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चार साल से जलती यूरोप की धरती: युद्ध नहीं, विश्व व्यवस्था का क्षरण

On: February 24, 2026 10:03 PM
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संपादकीय।
फरवरी 2022 में शुरू हुआ रूस–यूक्रेन युद्ध अब चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है और यह केवल दो देशों के बीच का सैन्य संघर्ष नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर खड़ा एक कठोर प्रश्न बन गया है। मोर्चे जमे हुए हैं, संसाधन लगातार क्षीण हो रहे हैं और निर्णायक जीत का कोई संकेत नहीं दिखता। यह युद्ध अब जीतने की नहीं, बल्कि एक-दूसरे को थकाने की लड़ाई बन चुका है, जिसमें ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइलें, साइबर हमले और सैटेलाइट आधारित निगरानी नई रणनीतिक वास्तविकता गढ़ रहे हैं। रूस NATO के विस्तार को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताता है, जबकि यूक्रेन इसे अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र अस्तित्व का प्रश्न मानता है—और इसी टकराव ने अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को नैतिक संकट के सामने खड़ा कर दिया है। पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूसी अर्थव्यवस्था को झटका दिया, पर उसे रोका नहीं; ऊर्जा निर्यात और नए व्यापारिक रास्तों ने मॉस्को को सहारा दिया, जबकि यूक्रेन बाहरी सहायता पर निर्भर युद्ध-राज्य में बदल गया। इस संघर्ष की वास्तविक कीमत यूरोप की महंगी ऊर्जा, एशिया और अफ्रीका के खाद्य संकट और वैश्विक महंगाई के रूप में पूरी दुनिया चुका रही है। चार वर्षों की असफल वार्ताएँ यह संकेत देती हैं कि कूटनीति फिलहाल राजनीतिक हठ के सामने पराजित है—रूस पीछे हटने को तैयार नहीं, यूक्रेन क्षेत्रीय समझौते को आत्मसमर्पण मानता है और पश्चिम संतुलन साधने में व्यस्त है। इस बीच सबसे भयावह सच्चाई शरणार्थी शिविरों, खंडहर हो चुके शहरों और युद्ध के साये में पलती एक पूरी पीढ़ी के मानसिक आघात में दर्ज हो रही है। चार साल बाद तस्वीर साफ है—रूस ने दबदबे का संदेश दिया पर वैश्विक अविश्वास झेला, यूक्रेन ने अदम्य प्रतिरोध दिखाया पर भारी विनाश सहा, और पश्चिम एकजुट तो हुआ लेकिन आर्थिक दबाव में आ गया। यह युद्ध बता रहा है कि 21वीं सदी में शक्ति-राजनीति समाप्त नहीं हुई है और “नियम-आधारित विश्व व्यवस्था” का दावा गहरे संकट में है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि युद्ध कब खत्म होगा, बल्कि यह है कि क्या विश्व समुदाय शांति लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति रखता है या लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों को नई वैश्विक सामान्य स्थिति के रूप में स्वीकार कर चुका है, क्योंकि हर बीतते दिन के साथ यह स्पष्ट होता जा रहा है कि यह युद्ध किसी की जीत नहीं बल्कि वैश्विक नेतृत्व की सामूहिक विफलता का जीवित स्मारक है।

मुख्य संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से

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