फ्रंट पेज न्यूज डेस्क।
दुनिया आज जिस सबसे बड़े लेकिन सबसे कम स्वीकार किए गए संकट से गुजर रही है, वह है लगातार बढ़ती जनसंख्या का दबाव। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि संसाधनों, रोजगार, पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता पर मंडराता हुआ एक वास्तविक वैश्विक खतरा है। पृथ्वी की क्षमता सीमित है, लेकिन मानव संख्या असीमित गति से बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें बार-बार चेतावनी देती रही हैं कि आने वाले दशकों में जनसंख्या वृद्धि का सबसे बड़ा भार एशिया और अफ्रीका पर होगा, जबकि संसाधनों का असमान वितरण पहले से ही वैश्विक असंतुलन को गहरा कर चुका है। सवाल केवल यह नहीं कि कितने लोग हैं, बल्कि यह है कि क्या उनके लिए पर्याप्त पानी, भोजन, ऊर्जा, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य उपलब्ध है?

विकासशील देशों के शहर जनसंख्या के बोझ तले दम तोड़ रहे हैं—बढ़ती झुग्गियाँ, बेरोजगार युवा, प्रदूषित हवा और घटते जल स्रोत इस बात के संकेत हैं कि जनसंख्या वृद्धि अब आर्थिक अवसर नहीं, बल्कि प्रशासनिक और मानवीय संकट बनती जा रही है। दूसरी ओर विकसित देशों में घटती जन्मदर और वृद्ध होती आबादी एक अलग चुनौती खड़ी कर रही है, जिससे स्पष्ट होता है कि दुनिया एक ही समय में दो विपरीत जनसंख्या संकटों से जूझ रही है। यह असंतुलन वैश्विक श्रम बाजार, प्रवासन और आर्थिक शक्ति-संतुलन को भी प्रभावित कर रहा है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जनसंख्या पर चर्चा अभी भी राजनीतिक संकोच और सामाजिक संवेदनशीलता के कारण ईमानदारी से नहीं हो रही। इसे केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता या सांस्कृतिक पहचान के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति ने इसे नीतिगत प्राथमिकता बनने से रोक दिया है। जबकि सच्चाई यह है कि अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि सीधे तौर पर गरीबी, कुपोषण, जल संकट, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक अस्थिरता को बढ़ाती है। अधिक लोग मतलब अधिक उपभोग, अधिक कचरा, अधिक ऊर्जा की मांग और प्राकृतिक संसाधनों पर असहनीय दबाव। पृथ्वी का पारिस्थितिक संतुलन इस बोझ को लंबे समय तक झेलने की स्थिति में नहीं है।
भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती और भी जटिल है, जहां युवा आबादी को “जनसांख्यिकीय लाभांश” कहा जाता है, लेकिन रोजगार सृजन की गति उस अनुपात में नहीं है। यदि शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर नहीं बढ़े, तो यही जनसंख्या लाभांश सामाजिक असंतोष और आर्थिक अस्थिरता में बदल सकता है। यह केवल राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और सुरक्षा का प्रश्न है, क्योंकि बेरोजगार और निराश युवा किसी भी समाज को अस्थिर कर सकते हैं।
स्पष्ट है कि जनसंख्या का प्रश्न केवल परिवार नियोजन का नहीं, बल्कि समग्र विकास मॉडल का प्रश्न है—महिला शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, आर्थिक समानता, शहरी नियोजन और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण के बिना इस संकट का समाधान संभव नहीं। दुनिया को यह स्वीकार करना होगा कि अनंत जनसंख्या वृद्धि सीमित संसाधनों वाली पृथ्वी पर संभव नहीं है।
आज आवश्यकता कठोर लेकिन संवेदनशील नीतिगत निर्णयों की है, क्योंकि यदि अभी भी जनसंख्या को केवल आंकड़ों में मापा जाता रहा तो आने वाला समय पानी, भोजन और रहने की जगह के लिए संघर्ष का होगा। बढ़ती जनसंख्या मानव शक्ति का प्रतीक तब बनती है जब उसके साथ अवसर और संसाधन भी बढ़ें; अन्यथा वही जनसंख्या वैश्विक अस्थिरता का सबसे बड़ा कारण बन जाती है। सच्चाई यही है कि यह मुद्दा भविष्य का नहीं, वर्तमान का संकट है—और यदि इसे अभी नहीं संभाला गया तो विकास की पूरी बहस केवल भीड़ प्रबंधन तक सिमट कर रह जाएगी।





























