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निजता का सम्मान करो, या भारत छोड़ो, सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक और बिग टेक को सख़्त चेतावनी

On: February 4, 2026 11:20 AM
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संपादकीय।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल युग की सबसे बड़ी बहस पर बिना किसी लाग-लपेट के अपना रुख़ साफ़ कर दिया है—नागरिकों की निजता से कोई समझौता नहीं होगा। मेटा और व्हाट्सएप जैसी वैश्विक तकनीकी कंपनियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी महज़ एक कानूनी चेतावनी नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक संप्रभुता का उद्घोष है।
न्यायालय का संदेश स्पष्ट है:
भारत कोई डेटा कॉलोनी नहीं है। यहाँ व्यापार करना है, तो भारतीय क़ानून और संविधान का सम्मान करना ही होगा।
निजता कोई सुविधा नहीं, मौलिक अधिकार है
सुप्रीम कोर्ट पहले ही ऐतिहासिक पुट्टस्वामी फ़ैसले में निजता को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार घोषित कर चुका है। ऐसे में यह तर्क कि “यदि शर्तें पसंद नहीं, तो प्लेटफ़ॉर्म छोड़ दें”—न केवल असंवेदनशील है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों का खुला उल्लंघन भी है।
जब कोई डिजिटल कंपनी नागरिकों को “या तो नीति मानो, या सेवा छोड़ो” की स्थिति में खड़ा करती है, तो यह डिजिटल दबाव और कॉर्पोरेट तानाशाही का रूप ले लेता है।
डेटा नया संसाधन है—लेकिन मालिक नागरिक है
आज के दौर में डेटा सबसे क़ीमती संसाधन बन चुका है। भारत की विशाल आबादी के कारण यहाँ का डेटा वैश्विक कंपनियों के लिए सोने की खान है। लेकिन सवाल यह है—
क्या इस डेटा पर पहला अधिकार कंपनियों का है, या नागरिकों का?
सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी इसी बिंदु पर केंद्रित है। उपयोगकर्ता की सहमति यदि मजबूरी में ली जाए, तो वह सहमति नहीं, बल्कि शोषण है।
डिजिटल औपनिवेशिक सोच पर करारा प्रहार
कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अब भी भारत को केवल एक बड़ा बाज़ार समझती हैं—जहाँ नियम लचीले हों और मुनाफ़ा सर्वोपरि। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस सोच पर सीधा प्रहार है।
न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि
संविधान से ऊपर कोई कॉर्पोरेट नीति नहीं हो सकती।
सरकार और नियामकों की भी परीक्षा
यह चेतावनी केवल कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि सरकार और नियामक संस्थाओं के लिए भी है।
डिजिटल पर्सनल डेटा संरक्षण क़ानून का प्रभावी क्रियान्वयन, पारदर्शी निगरानी और सख़्त दंड—अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता हैं।
यदि अदालत की भावना को ज़मीन पर नहीं उतारा गया, तो यह सख़्ती केवल काग़ज़ों तक सिमट कर रह जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ़ कर दिया है कि भारत में
नागरिक केवल यूज़र नहीं हैं
डेटा सिर्फ़ व्यापारिक वस्तु नहीं है
और निजता कोई सौदेबाज़ी का विषय नहीं है
भारत में रहकर भारत के अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता।
निजता का सम्मान करो—या भारत छोड़ो।

मुख्य संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से

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