ओमान में फंसी भारतीय लड़कियाँ: कुछ लौटीं, दर्जनों अब भी कैद हालात में
फ्रंट पेज न्यूज़ नई दिल्ली/चंडीगढ़।
खाड़ी देश ओमान में नौकरी के नाम पर भारतीय लड़कियों और महिलाओं को फंसाने का मामला अब महज़ ठगी नहीं, बल्कि एक संगठित और क्रूर मानव तस्करी नेटवर्क की भयावह तस्वीर पेश कर रहा है। हाल के दिनों में कुछ पीड़ित महिलाओं की स्वदेश वापसी जरूर हुई है, लेकिन उनकी जुबानी सच्चाई ने देश को झकझोर कर रख दिया है।

लौटकर आई महिलाओं का दावा है कि अब भी 50 से अधिक भारतीय लड़कियाँ ओमान में अमानवीय, बंधुआ जैसे हालात में फंसी हुई हैं, जिनकी आवाज़ न तो सुनी जा रही है और न ही उन्हें बाहर निकलने दिया जा रहा है।
पीड़िताओं के अनुसार भारत में सक्रिय एजेंटों ने ऊँचे वेतन, सुरक्षित नौकरी और बेहतर भविष्य का झांसा देकर उन्हें ओमान भेजा। लेकिन मस्कट पहुंचते ही सपनों का यह महल ढह गया। पासपोर्ट जब्त कर लिए गए, मनमाने और जबरन काम करवाए गए, महीनों तक वेतन नहीं दिया गया और विरोध करने पर धमकियों, मानसिक

प्रताड़ना व झूठे मुकदमों का डर दिखाया गया। कई महिलाओं को इस कदर तोड़ दिया गया कि वे भारत लौटने की बात सोचने से भी डरने लगीं।
लौटी हुई महिलाओं ने बताया कि उनसे जबरदस्ती ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए, जिनकी भाषा तक वे नहीं समझती थीं। नौकरी बदलने या भारत लौटने की अनुमति सिरे से नकार दी गई। शिकायत करने पर जेल भेजने, फर्जी आपराधिक मामलों में फंसाने और परिवार को नुकसान पहुंचाने तक की धमकियाँ दी गईं। यह पूरा घटनाक्रम साफ संकेत देता है कि मामला किसी एक एजेंट या कंपनी तक सीमित नहीं, बल्कि एक गहरे, सुनियोजित और अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी गिरोह का हिस्सा है।
हालांकि राहत की बात यह है कि सामाजिक संगठनों, कुछ जनप्रतिनिधियों और भारतीय दूतावास के हस्तक्षेप से हाल ही में कई महिलाओं को सुरक्षित भारत लाया गया, लेकिन असली सवाल अब भी जस का तस है—जो महिलाएँ अभी भी ओमान में फंसी हैं, उन्हें कब और कैसे आज़ादी मिलेगी? परिवारों की बेचैनी, बेटियों की खामोश पुकार और सरकारों की सीमित कार्रवाई इस संकट को और गंभीर बना रही है।
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि जब तक भारत में सक्रिय अवैध और फर्जी एजेंट नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक गरीब और बेरोजगार युवतियाँ इसी तरह सपनों के नाम पर शोषण का शिकार होती रहेंगी। केवल विदेशों में रेस्क्यू ऑपरेशन काफी नहीं, बल्कि देश के भीतर इस गंदे धंधे की जड़ें काटना अनिवार्य है।
सरकार और विदेश मंत्रालय ने संकट में फंसे भारतीय नागरिकों के लिए आपात सहायता के रास्ते जरूर खोले हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि डर, भाषा की बाधा और पासपोर्ट जब्ती जैसी स्थितियों में फंसी महिलाएँ इन संसाधनों तक पहुंच ही नहीं पातीं।
परिवारों के लिए यह एक सख्त चेतावनी है कि विदेश में नौकरी के नाम पर भेजने से पहले एजेंट का सरकारी पंजीकरण जरूर जांचें, बिना लिखित अनुबंध किसी को न भेजें और किसी भी हाल में पासपोर्ट एजेंट के हवाले न करें।
संपादकीय संकेत:
ओमान की यह घटना एक बार फिर देश के सामने कड़वा सवाल रखती है—क्या आज भी गरीबी और बेरोजगारी के बीच फंसी युवतियाँ “बेहतर भविष्य” के झूठे सपनों की सबसे आसान शिकार हैं? और क्या मानव तस्करी के इस कारोबार पर करारी चोट किए बिना हम ऐसी त्रासदियों को रोक पाने में सक्षम हैं? जब तक तस्करों पर सख्त, त्वरित और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसी खबरें केवल अख़बारों के फ्रंट पेज बदलती रहेंगी, लेकिन पीड़िताओं की किस्मत नहीं।




























