संपादकीय।
हिमाचल की स्कूली शिक्षा फिर एक नए मोड़ पर खड़ी है। सरकारी सीबीएसई स्कूलों में परीक्षा-आधारित मेरिट से शिक्षकों की तैनाती, चुनिंदा स्कूलों का मर्जर और बोर्ड पैटर्न को लेकर नई बहस—यह सब सुधार के नाम पर हो रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम शिक्षा सुधार कर रहे हैं या व्यवस्था को प्रयोगशाला बना चुके हैं?
परिणाम खराब थे या नीति अस्थिर है?
Himachal Pradesh Board of School Education के परिणाम वर्षों से 80% के आसपास रहे हैं। National Council of Educational Research and Training द्वारा आयोजित National Achievement Survey में भी हिमाचल का प्रदर्शन कई विषयों में राष्ट्रीय औसत के बराबर या बेहतर रहा है। यदि आधार इतना कमजोर नहीं था, तो फिर इतनी हड़बड़ी क्यों?
क्या समस्या पाठ्यक्रम में थी, या क्रियान्वयन में? यदि शिक्षक की कमी, अधोसंरचना की विषमता और राजनीतिक हस्तक्षेप ही असली रोग हैं, तो इलाज बोर्ड बदलना कैसे हो गया?
CBSE का नाम, लेकिन संसाधन कहाँ?
Central Board of Secondary Education (CBSE) का ढांचा राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के अनुरूप है—यह तर्क दिया जा रहा है। पर क्या हिमाचल के हर सरकारी स्कूल में विषय-विशेषज्ञ शिक्षक, सुसज्जित लैब, आईसीटी सुविधाएँ और सतत प्रशिक्षण उपलब्ध हैं?
यदि नहीं, तो केवल “CBSE” का बोर्ड लगा देने से गुणवत्ता नहीं बढ़ेगी। बिना संसाधन-सुदृढ़ीकरण के यह कदम प्रतीकात्मक अधिक और संरचनात्मक कम प्रतीत होता है।
मेरिट या मनोबल?
परीक्षा-आधारित तैनाती को पारदर्शिता का नाम दिया जा रहा है। पर क्या यह सुनिश्चित किया गया कि सभी शिक्षकों को समान प्रशिक्षण और संक्रमण-काल मिला? शिक्षा-शोध स्पष्ट बताते हैं कि शिक्षक का मनोबल सीधे सीखने के परिणामों से जुड़ा है। यदि नीति का संदेश यह हो कि वर्षों का अनुभव अचानक संदिग्ध है, तो क्या हम गुणवत्ता बढ़ा रहे हैं या असुरक्षा?
स्कूल मर्जर: बचत की गणित, सामाजिक लागत की अनदेखी
कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के मर्जर से प्रति-विद्यार्थी लागत घट सकती है—यह प्रशासनिक तर्क है। लेकिन पहाड़ी प्रदेश में 3–5 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी भी नामांकन और उपस्थिति पर असर डाल सकती है। यदि ड्रॉपआउट बढ़े, तो कागज़ी बचत सामाजिक नुकसान में बदल जाएगी।
क्या मर्जर से पहले और बाद के आंकड़े सार्वजनिक किए गए? क्या प्रभाव-अध्ययन हुआ? या फिर निर्णय पहले और मूल्यांकन बाद में?
एकरूपता का भ्रम
एक समान शिक्षा प्रणाली सुनने में आकर्षक है—एक पाठ्यक्रम, एक परीक्षा, एक ढांचा। पर भारत जैसे विविध समाज में “Uniformity” से अधिक आवश्यक “Equity” है। दूरस्थ और शहरी स्कूलों की वास्तविकताएँ अलग हैं। समान अवसर का अर्थ है संसाधन-समानता, न कि केवल बोर्ड-समानता।
असली प्रश्न: स्थिरता
हिमाचल में शिक्षा नीति का इतिहास बताता है कि हर सत्ता परिवर्तन के साथ ढांचा हिलता है। कभी पैटर्न बदला, कभी भर्ती प्रक्रिया, कभी मूल्यांकन प्रणाली। यह अस्थिरता ही सबसे बड़ा संकट है। शिक्षा पाँच वर्ष की राजनीतिक अवधि से नहीं, पीढ़ियों से जुड़ी होती है।
यदि नीति बार-बार बदलेगी, तो शिक्षक अनिश्चित रहेंगे, विद्यार्थी भ्रमित होंगे और अभिभावक असमंजस में। सुधार की पहचान निरंतरता से होती है, न कि त्वरित घोषणाओं से।
निष्कर्ष: सुधार चाहिए, प्रतीकात्मक बदलाव नहीं
हिमाचल की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल नहीं रही; आंकड़े इसका समर्थन करते हैं। सुधार की आवश्यकता है—पर वह संसाधन, प्रशिक्षण और पारदर्शिता के माध्यम से हो, न कि केवल बोर्ड-परिवर्तन या मर्जर के निर्णय से।
तीखा सवाल यही है: क्या हम शिक्षा को दीर्घकालिक सामाजिक निवेश मानते हैं, या हर नई सरकार के लिए नीतिगत प्रदर्शन का मंच?
हिमाचल को अब प्रयोग नहीं, स्थिर और प्रमाण-आधारित शिक्षा नीति चाहिए—जहाँ बदलाव आंकड़ों से संचालित हों, न कि राजनीतिक आवेग से। तभी शिक्षा सुधार का माध्यम बनेगी, विवाद का नहीं।
शिक्षा या प्रयोगशाला? हिमाचल में बदलते पैटर्न पर तीखा सवाल
On: February 22, 2026 12:58 PM




























