फ्रंट पेज संपादकीय।
कभी वित्तीय अनुशासन और संतुलित विकास के लिए पहचाने जाने वाला हिमाचल प्रदेश आज गहरे आर्थिक संकट की गिरफ्त में है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि विकास कार्यों पर ब्रेक लगने के बावजूद राज्य का घाटा हजारों करोड़ रुपये में पहुंच चुका है। बढ़ता कर्ज, ठप पड़ी परियोजनाएं और आम जनता पर लगातार बढ़ता टैक्स—ये सब प्रदेश की बिगड़ती आर्थिक सेहत के स्पष्ट संकेत हैं।
घोषणा-पत्रों की राजनीति और बिना गणना के वादे
प्रदेश की मौजूदा वित्तीय बदहाली के मूल में चुनावी राजनीति की वही पुरानी बीमारी है—बिना आकलन, बिना संसाधन और बिना दीर्घकालिक सोच के किए गए लोकलुभावन वादे। हर चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं की होड़ लगती है, लेकिन यह कभी नहीं बताया जाता कि राज्य की आय क्या है और इन योजनाओं का स्थायी वित्तीय स्रोत कहां से आएगा।
महिलाओं को प्रतिमाह ₹1500, 300 यूनिट मुफ्त बिजली, तरह-तरह की फ्री सुविधाएं—घोषणाएं आकर्षक हैं, पर इनका बोझ अंततः राज्य के खजाने पर पड़ता है।
मुफ्त योजनाओं की कीमत कौन चुका रहा है?
सच यह है कि मुफ्त कुछ भी नहीं होता। बिजली भले ही सस्ती या मुफ्त दिखाई जाए, लेकिन उसकी भरपाई टैक्स, सरचार्ज और अतिरिक्त शुल्कों के रूप में जनता से वसूली जाती है। पेट्रोल-डीजल, पानी, परिवहन और रोजमर्रा की जरूरतों पर बढ़ते करों ने मध्यम वर्ग, गरीब तबके, कर्मचारियों और पेंशनरों की कमर तोड़ दी है।
सीमित आय वाले वर्ग पर बढ़ता खर्च साफ बता रहा है कि लोकलुभावन नीतियों की कीमत आम आदमी चुका रहा है।
अनावश्यक पद सृजन और सरकारी ढांचे का बोझ
राज्य में जरूरत से अधिक बोर्ड, निगम, आयोग और पदों का सृजन भी खजाने पर भारी पड़ रहा है। कई संस्थान ऐसे हैं जिनका न तो स्पष्ट उद्देश्य है और न ही कोई ठोस परिणाम। बावजूद इसके, वेतन, भत्ते, सरकारी वाहन और सुविधाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
राजनीतिक नियुक्तियां, सलाहकारों की बढ़ती फौज और अस्थायी व्यवस्थाएं आर्थिक अनुशासन को पूरी तरह खोखला कर चुकी हैं।
विधायक-सांसद सुविधाएं बनाम जनता का त्याग
विडंबना यह है कि सरकार एक ओर जनता से त्याग की अपील करती है, तो दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों के वेतन, पेंशन और भत्तों पर कोई ठोस कटौती नहीं दिखती। सरकारी गाड़ियां, आवास और विशेष सुविधाएं जस की तस बनी हुई हैं।
यह दोहरा मापदंड जनता के भीतर असंतोष और आक्रोश को लगातार बढ़ा रहा है।
विकास योजनाएं ठप, भविष्य अधर में
आर्थिक दबाव का सबसे बड़ा खामियाजा विकास को भुगतना पड़ रहा है। सड़कें, स्वास्थ्य, शिक्षा, जल आपूर्ति और पर्यटन से जुड़ी अनेक परियोजनाएं या तो ठप हैं या कछुआ गति से चल रही हैं। विकास रुकता है तो रोजगार घटता है और राज्य की दीर्घकालीन आय पर सीधा असर पड़ता है—एक ऐसा दुष्चक्र, जिससे निकलना और कठिन होता जा रहा है।
क्या यही राजनीतिक दूरदर्शिता है?
बिना सोचे-समझे वादे, मुफ्त योजनाओं की अंधी राजनीति और वित्तीय अनुशासन की अनदेखी ने हिमाचल को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां कर्ज भविष्य को निगल रहा है और वर्तमान जनता पर बोझ बन चुका है।
अब समय है कि राजनीतिक दल आत्ममंथन करें,
लोकलुभावन घोषणाओं से ऊपर उठें और राज्य की वास्तविक आर्थिक क्षमता के अनुरूप नीतियां बनाएं। अन्यथा इसका खामियाजा केवल सरकार नहीं, बल्कि हिमाचल की पूरी जनता भुगतेगी।
प्रदेश की जनता आज एक ही सवाल पूछ रही है—
क्या सत्ता की कुर्सी के लिए प्रदेश का भविष्य दांव पर लगाना जायज़ है?





























