संपादकीय।
1 मई से आरंभ होने वाली राष्ट्रीय जनगणना केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि देश की विकास यात्रा का आधार स्तंभ है। हर दस वर्ष में आयोजित यह महाअभियान भारत की सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय तस्वीर को स्पष्ट करता है। इसका संचालन भारत का रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त कार्यालय द्वारा, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन किया जाता है, और इसकी वैधानिक शक्ति जनगणना अधिनियम 1948 से प्राप्त होती है।
जनगणना दरअसल केवल लोगों की गिनती नहीं है; यह राष्ट्र की नब्ज टटोलने की प्रक्रिया है। कितने लोग, कहाँ रहते हैं, उनकी शिक्षा, आजीविका, भाषा, आवासीय स्थिति और सामाजिक संरचना क्या है—इन सभी प्रश्नों के उत्तर ही भविष्य की नीतियों की दिशा तय करते हैं। शिक्षा संस्थानों की आवश्यकता हो, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, सड़क और जल आपूर्ति जैसी आधारभूत सुविधाएँ हों या रोजगार योजनाओं की संरचना—हर स्तर पर जनगणना के आंकड़े ही आधार बनते हैं।
विशेष रूप से वर्तमान समय में, जब देश तीव्र शहरीकरण, प्रवासन और तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा है, अद्यतन और विश्वसनीय आंकड़ों की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। डिजिटल माध्यमों से डेटा संग्रह, मोबाइल एप के उपयोग और संभावित स्वयं-गणना (Self Enumeration) जैसे प्रयास इस दिशा में पारदर्शिता और दक्षता को बढ़ा सकते हैं। किंतु तकनीकी सुदृढ़ता के साथ-साथ जमीनी स्तर पर जागरूकता और सहयोग भी उतना ही आवश्यक है।
यह भी स्मरणीय है कि जनगणना के दौरान दी गई व्यक्तिगत जानकारी पूर्णतः गोपनीय रहती है और उसे केवल सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए ही उपयोग किया जाता है। नागरिकों का यह विश्वास ही इस प्रक्रिया की सफलता का आधार है। अतः प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वह सही और तथ्यात्मक जानकारी प्रदान करे।
जनगणना लोकतंत्र की एक मौन, किंतु अत्यंत प्रभावशाली प्रक्रिया है। यह न तो राजनीतिक मंच है और न ही केवल आंकड़ों का खेल; यह राष्ट्र के भविष्य की रूपरेखा तैयार करने का अवसर है। 1 मई से शुरू हो रहा यह अभियान हमें याद दिलाता है कि विकास की ठोस नींव सटीक आंकड़ों पर ही रखी जाती है।
अब यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि इस राष्ट्रीय कर्तव्य में सक्रिय भागीदारी निभाएँ, ताकि आने वाले दशक की योजनाएँ यथार्थ के आधार पर निर्मित हो सकें और विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।





























