फ्रंट पेज न्यूज़ नई दिल्ली।
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़े ढांचागत बदलाव का मार्ग प्रशस्त करने वाले विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 की गहन जांच के लिए संसद की 31 सदस्यीय संयुक्त समिति का गठन कर दिया गया है। लोकसभा सचिवालय की अधिसूचना के अनुसार समिति की अध्यक्षता वरिष्ठ सांसद डॉ. डी. पुरंदेश्वरी को सौंपी गई है, जबकि इसमें लोकसभा सांसद अनुराग सिंह ठाकुर सहित सत्ता और विपक्ष के कई प्रमुख नेताओं को शामिल किया गया है। समिति का मुख्य कार्य विधेयक के प्रावधानों की विस्तृत पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपना होगा, जिसके आधार पर आगे की विधायी प्रक्रिया तय होगी।

समिति में लोकसभा से संबित पात्रा, तेजस्वी सूर्या, अनुराग सिंह ठाकुर, बांसुरी स्वराज, हेमांग जोशी, ललित वर्मा और प्रो. सौगत राय जैसे सदस्य शामिल हैं, वहीं राज्यसभा से सुधांशु त्रिवेदी, दिग्विजय सिंह, सागरिका घोष, सस्मित पात्रा, संजय कुमार झा और प्रो. रामगोपाल यादव को नामित किया गया है। विभिन्न दलों के प्रतिनिधित्व वाली यह समिति विधेयक पर व्यापक राजनीतिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से विचार-विमर्श करेगी, जिससे उच्च शिक्षा के भविष्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण कानून पर संतुलित और ठोस सुझाव सामने आ सकें।
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक का मूल उद्देश्य देश की उच्च शिक्षा के लिए एकीकृत नियामक ढांचा तैयार करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई जैसी मौजूदा संस्थाओं की जगह एक केंद्रीय निकाय “विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान” स्थापित किया जाएगा, जिसके अंतर्गत नियमन, मान्यता, शैक्षणिक मानक और मूल्यांकन के लिए अलग-अलग परिषदें कार्य करेंगी। इसके साथ ही सिंगल-विंडो डिजिटल अनुमति प्रणाली, संस्थानों को ग्रेडेड स्वायत्तता, पारदर्शी मूल्यांकन तंत्र, विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति और नियमों के उल्लंघन पर आर्थिक दंड जैसे प्रावधान भी प्रस्तावित किए गए हैं।
सरकार का मानना है कि यह विधेयक नई शिक्षा नीति के अनुरूप उच्च शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता, गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा, जबकि शिक्षा जगत के कुछ विशेषज्ञ इसे नियामक ढांचे के केंद्रीकरण की दिशा में बड़ा कदम मानते हुए व्यापक चर्चा की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में संयुक्त समिति की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यही समिति हितधारकों से सुझाव लेकर विधेयक के स्वरूप को अंतिम रूप देने में निर्णायक साबित होगी।




























