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आरटीआई से बाहर विजिलेंस: पारदर्शिता की कसौटी पर सरकार का फैसला

मुख्य संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ (प्रमेश शर्मा)।


हिमाचल प्रदेश में शासन व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस उस समय तेज हो गई जब राज्य सरकार ने विजिलेंस एवं एंटी-करप्शन ब्यूरो को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के दायरे से बाहर करने का निर्णय लिया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरटीआई कानून को नागरिकों के हाथ में सबसे मजबूत निगरानी उपकरण माना जाता रहा है। इसी कानून के जरिए पिछले दो दशकों में देशभर में प्रशासनिक अनियमितताओं, भ्रष्टाचार और नीतिगत विसंगतियों के अनेक मामलों का खुलासा हुआ है। ऐसे में भ्रष्टाचार की जांच करने वाली संस्था को ही सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन गया है।


दरअसल हिमाचल प्रदेश सरकार ने यह कदम सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 24(4) के तहत उठाया है। इस प्रावधान के अनुसार राज्य सरकारें सुरक्षा और खुफिया प्रकृति की संस्थाओं को अधिसूचना जारी कर आरटीआई से छूट दे सकती हैं। इसी कानूनी प्रावधान का उपयोग करते हुए राज्य के विजिलेंस एवं एंटी-करप्शन ब्यूरो को भी इस दायरे से बाहर किया गया है। तकनीकी रूप से यह निर्णय कानून के अनुरूप अवश्य है, लेकिन इसकी व्याख्या और प्रभाव को लेकर प्रशासनिक और लोकतांत्रिक दोनों स्तरों पर बहस तेज हो गई है।


सरकार का पक्ष स्पष्ट है। उसका कहना है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच में कई संवेदनशील दस्तावेज, गोपनीय स्रोत और रणनीतिक सूचनाएं शामिल होती हैं। यदि इनसे संबंधित जानकारी आरटीआई के माध्यम से सार्वजनिक हो जाए तो जांच की दिशा प्रभावित हो सकती है और आरोपित पक्ष को जांच की रणनीति का संकेत मिल सकता है। सरकार का यह भी तर्क है कि देश में कई केंद्रीय खुफिया एजेंसियों और कुछ अन्य राज्यों की संस्थाओं को भी इसी प्रकार की छूट प्राप्त है, इसलिए इसे जांच प्रक्रिया की सुरक्षा से जोड़कर देखा जाना चाहिए।


लेकिन आलोचकों की चिंता इससे अलग है। उनका कहना है कि विजिलेंस एवं एंटी-करप्शन ब्यूरो का मूल उद्देश्य ही सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार की जांच करना और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। यदि यही संस्था सूचना के अधिकार से बाहर हो जाती है तो आम नागरिक के लिए यह जानना लगभग असंभव हो जाएगा कि भ्रष्टाचार की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, कितने मामलों में प्रारंभिक जांच हुई, कितनों में एफआईआर दर्ज हुई और कितने मामलों में अभियोजन की अनुमति दी गई।


यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता का प्रश्न खड़ा होता है। पहले नागरिक आरटीआई अधिनियम के माध्यम से यह जानकारी प्राप्त कर सकते थे कि विजिलेंस के पास कितनी शिकायतें पहुंचीं, कितने मामलों में जांच लंबित है और किन मामलों में कार्रवाई आगे बढ़ी। कई बार इसी प्रक्रिया से यह भी सामने आया कि कुछ शिकायतें वर्षों तक फाइलों में दबकर पड़ी रहती हैं। इस तरह आरटीआई केवल सूचना प्राप्त करने का माध्यम नहीं था, बल्कि जांच एजेंसियों पर सार्वजनिक निगरानी का एक प्रभावी तंत्र भी था।


राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत हर वर्ष लगभग 60 से 70 लाख आवेदन दाखिल किए जाते हैं। मनरेगा में अनियमितताओं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में गड़बड़ी और सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता के सवाल जैसे अनेक मुद्दे इसी कानून के माध्यम से सामने आए। यही कारण है कि आरटीआई को लोकतंत्र की बुनियादी जवाबदेही व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।


हालांकि कानून में यह व्यवस्था अभी भी बनी हुई है कि भ्रष्टाचार या मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित जानकारी आरटीआई के माध्यम से मांगी जा सकती है। लेकिन व्यवहारिक अनुभव यह बताता है कि ऐसे मामलों में सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया जटिल हो जाती है और अक्सर जानकारी सीमित या विलंब से उपलब्ध कराई जाती है। इससे पारदर्शिता का उद्देश्य आंशिक रूप से प्रभावित होता है।


असल सवाल यह नहीं है कि जांच एजेंसियों को गोपनीयता की आवश्यकता है या नहीं—यह स्पष्ट है कि किसी भी जांच प्रक्रिया में एक सीमा तक गोपनीयता आवश्यक होती है। असली प्रश्न यह है कि गोपनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यदि जांच की सुरक्षा के नाम पर पूरी संस्था को सूचना से बाहर कर दिया जाए तो इससे पारदर्शिता कमजोर पड़ सकती है, और यदि हर विवरण सार्वजनिक हो जाए तो जांच की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है।


हिमाचल प्रदेश सरकार का यह निर्णय इसी संतुलन की कसौटी पर खड़ा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस व्यवस्था के बावजूद भ्रष्टाचार की जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहती है या नहीं। यदि नागरिकों को यह महसूस होता है कि जानकारी तक पहुंच कठिन हो गई है, तो यह विषय भविष्य में न्यायिक समीक्षा और व्यापक सार्वजनिक बहस का केंद्र भी बन सकता है।


लोकतंत्र की असली ताकत केवल संस्थाओं में नहीं, बल्कि उन पर जनता की निगरानी में निहित होती है। इसलिए पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा है। हिमाचल प्रदेश का यह निर्णय भी अंततः इसी कसौटी पर परखा जाएगा।

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