आंसू ना होते आँखों में,
तो शायद इंसान इतना सच्चा न होता,
पर आजकल तो रोना भी “स्क्रिप्टेड” है,
हर दर्द का अपना “एजेंडा” होता।
दर्द ना होता दिल में अगर,
तो धड़कनों का क्या मोल रहता?
यहाँ तो नेता भी रोते हैं मंचों पर,
और पीछे पूरा “प्लान रोल” रहता।
इरादे अगर सच में शुद्ध होते,
तो मंदिर-मस्जिद खाली पड़ जाते,
पर वोटों के इस मौसम में जनाब,
भगवान भी “इलेक्शन मोड” में आ जाते।
आजकल आँसू भी ट्रेंड में हैं,
स्टेटस बनकर बहते हैं,
नेता जी की आँखों से गिरते ही,
सीधे “न्यूज़ चैनल” पे चढ़ते हैं।
दिल टूटे तो कविता बनती है,
वरना सब ठीक ही रहता है,
पर जनता का दिल टूटे रोज यहां,
वो सिर्फ “डेटा” बनकर रहता है।
वादा करते हैं हर बार नए,
“अच्छे दिन” फिर से लाने का,
पर कुर्सी मिलते ही भूल जाते हैं,
बस खेल चलता है “बहलाने” का।
तो मत पूछो क्यों जरूरी हैं ये आंसू,
ये ही तो असली कहानी कहते हैं,
बाकी सब तो भाषण के जादू हैं,
जो सच को धीरे-धीरे बहते हैं…


















