फाल्गुन मास की संक्रांति के साथ आरंभ होने वाला फागली उत्सव बंजार घाटी और समूचे सिराज क्षेत्र में अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और परंपरागत वैभव के साथ मनाया जाता है। यह उत्सव पांच प्रविष्टि फाल्गुन तक चलता है और विशेष रूप से भगवान विष्णु नारायण को समर्पित माना जाता है। जहां-जहां भगवान विष्णु नारायण के देवस्थान स्थापित हैं, वहां यह पर्व सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक उत्साह के रूप में जीवंत हो उठता है ।
फागली की सबसे विशिष्ट पहचान है “चोलू” — एक पारंपरिक परिधान, जो विशेष प्रकार की घास ‘शडूली’ से तैयार किया जाता है। इन चोलुओं का निर्माण 20 प्रविष्टि माघ से देव अनुमति लेकर आरंभ किया जाता है, ताकि वे फाल्गुन संक्रांति से पूर्व पूर्ण रूप से तैयार हो सकें। देवता के ‘हारियान’ (देव परंपरा से जुड़े विशिष्ट परिवारों) में से चिन्हित व्यक्ति ही इन चोलुओं को धारण करते हैं।
उत्सव के दौरान विशेष मुखौटे पहनकर पारंपरिक नृत्य किया जाता है। ढोल-नगाड़ों और देव धुन की गूंज के बीच यह चोलू-मुखौटा नृत्य पूरे क्षेत्र में परिक्रमा करता है। नृत्य के दौरान पारंपरिक शब्दों और वाचिक अभिव्यक्तियों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें लोक-हास्य, सामाजिक संदेश और देव ऋतु के निर्वहन की झलक मिलती है। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही देव संस्कृति का जीवंत प्रदर्शन है।
वाद्य यंत्रों में भी इस अवसर पर पारंपरिक वाद्यों का विशेष महत्व होता है, जो उत्सव की गरिमा और आध्यात्मिक वातावरण को और प्रखर बना देते हैं। पूरे क्षेत्र में उल्लास, रंग और लोक जीवन की जीवंतता का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है।
फागली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कृषि, प्रकृति और आस्था से जुड़ा लोक विश्वास है। मान्यता है कि भगवान विष्णु नारायण को समर्पित यह उत्सव क्षेत्र में धन-धान्य की वृद्धि, उत्तम वर्षा, सुख-शांति और प्राकृतिक संतुलन का आशीर्वाद लेकर आता है। यही कारण है कि स्थानीय समुदाय इस पर्व को गहरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाता है।
ईनर सिराज के तीर्थन वैली, जीभी वैली, चैहणी, विणी, वेहलो, चेथर, कलबारी, थणीचेड़ सहित अनेक गांवों में फागली उत्सव विशेष उल्लास के साथ आयोजित होता है। पर्व के दिनों में पूरा क्षेत्र देव भक्ति, लोक परंपरा और सामूहिक आनंद के रंग में रंग जाता है।
फागली उत्सव बंजार घाटी की समृद्ध देव संस्कृति, सामुदायिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का सजीव प्रतीक है, जो आधुनिकता के दौर में भी लोक आस्था की जड़ों को मजबूती से थामे हुए है।




























