अभी तो रोस्टर आया नहीं,
पर सपनों का काफिला सज गया,
किस वार्ड में सूरज उगेगा—
ये जाने बिना ही “नेता” जन्म ले गया।
कहीं पोस्टर में मुस्कान चिपकी,
कहीं डिजिटल दाढ़ी में ईमान,
“कर्मठ, जुझारू, जनसेवक” लिखकर
खुद ही बन बैठे भगवान।
किसी ने लिखा— “आपका सेवक”,
और नीचे गाड़ी की फोटो चमकी,
जनता पूछे— “सेवा कब की?”
वो बोले— “अभी तो बस घोषणा थमी।”
व्हाट्सएप के स्टेटस में क्रांति,
फेसबुक पर विकास की बाढ़,
धरातल पर वही पुराने किस्से—
बस बदले हैं फोटो और आड़।
आरक्षण की लकीरें अभी धुंधली,
पर उम्मीदों का रंग गाढ़ा,
जिस वार्ड में नाम भी न पक्का—
वहीं से “जनता का सिपाही” निकला आधा।
कल तक जो चौपाल में चुप थे,
आज माइक के आगे शेर बने,
“गांव बदल देंगे” कहने वाले—
खुद की गली से ही ढेर बने।
ये लोकतंत्र का मेला भी अजब है,
यहाँ पहले नेता, फिर क्षेत्र तय,
पहले नारे, फिर मुद्दे खोजे—
और अंत में जनता याद आई भई!
पर व्यंग्य की इस हल्की चुभन में
एक सच्चाई भी छुपी रहती है—
अगर सच में सेवा का जज्बा हो,
तो बिना पोस्टर भी राह बनती है।

तो ऐ पोस्टर के वीर सिपाहियों,
थोड़ा ठहरो, थोड़ा सोचो,
नेतागिरी तस्वीरों से नहीं—
ज़मीनी पसीने से होती है, ये भी तो

















