फ्रंट पेज न्यूज़ कुल्लू।
देवभूमि कुल्लू, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है, आज सिंथेटिक नशे ‘चिट्टा’ और पारंपरिक रूप से फैली चरस की गिरफ्त में जूझ रही है। मनाली, कुल्लू, भुंतर, बंजार और आनी जैसे क्षेत्रों में युवाओं के बीच नशे की बढ़ती लत ने सामाजिक ताने-बाने को हिला कर रख दिया है। लगातार हो रही गिरफ्तारियों और बरामदगियों के बावजूद हालात में अपेक्षित सुधार न होना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
प्रदेश सरकार ‘चिट्टा मुक्त हिमाचल’ और जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा करती है, लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों से अलग नजर आती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि चरस को लंबे समय तक “पारंपरिक नशा” मानकर जिस तरह से सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर नरमी बरती गई, उसने युवाओं को नशे की ओर झुकाव देने में बड़ी भूमिका निभाई। आज वही पुराना नेटवर्क सिंथेटिक नशे ‘चिट्टा’ के कारोबार को भी सहारा देता दिखाई दे रहा है।
सबसे गंभीर आरोप पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आ रहे हैं। कुछ स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि नशे का कारोबार वर्षों से जारी है तो यह बिना किसी आंतरिक संरक्षण के संभव नहीं हो सकता। लोगों के बीच यह चर्चा आम है कि कुछ भ्रष्ट पुलिस अधिकारी और पुलिस जवान इस अवैध कारोबार को नजरअंदाज करने या कथित रूप से संरक्षण देने में संलिप्त हो सकते हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनमानस में पनप रहा अविश्वास अपने आप में चिंता का विषय है।
पुलिस विभाग समय-समय पर बरामदगी और गिरफ्तारी के आंकड़े जारी करता है, परंतु आम धारणा यह है कि कार्रवाई अक्सर छोटे तस्करों और नशा करने वालों तक सीमित रह जाती है। बड़े नेटवर्क और आर्थिक रूप से मजबूत तस्करों तक पहुंचने में अपेक्षित सख्ती दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि नशे का धंधा पूरी तरह समाप्त होने के बजाय स्वरूप बदलकर चलता रहता है। यदि तंत्र के भीतर ईमानदारी और जवाबदेही सुनिश्चित न हो, तो किसी भी नीति की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सामाजिक बुद्धिजीवियों का मत है कि समस्या केवल कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और नैतिक जवाबदेही की भी है। यदि कहीं भ्रष्टाचार की जड़ें हैं तो उन्हें उजागर कर सख्त कार्रवाई करना सरकार और पुलिस नेतृत्व की जिम्मेदारी है। साथ ही, नशा विरोधी अभियान को केवल घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय स्कूल-कॉलेज स्तर पर जागरूकता, पुनर्वास केंद्रों की मजबूती, पंचायत स्तर पर निगरानी समितियों का गठन और युवाओं के लिए रोजगार व खेल के अवसर बढ़ाना अनिवार्य है।
कुल्लू में ‘चिट्टा’ और चरस का फैलता जाल अब सामाजिक संकट का रूप ले चुका है। यदि देवभूमि को इस संकट से बाहर निकालना है तो केवल नारों से काम नहीं चलेगा। पारदर्शी जांच, भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई, निष्पक्ष पुलिसिंग और समाज की सक्रिय भागीदारी—इन सबका संयोजन ही इस जहर को जड़ से खत्म कर सकता है। वरना जीरो टॉलरेंस की नीति कागजों तक सीमित रह जाएगी और युवा पीढ़ी इस अंधेरे में भटकती रहेगी।




























