फ्रंट पेज न्यूज़ डेस्क।
हिमाचल प्रदेश मंत्रिमंडल की ताज़ा बैठक में लिए गए निर्णय केवल प्रशासनिक औपचारिकताएं नहीं हैं, बल्कि वे उस आर्थिक सच्चाई का आईना हैं जिससे प्रदेश की सरकार जूझ रही है। आबकारी नीति से तीन हजार करोड़ से अधिक राजस्व जुटाने का लक्ष्य, टोल बैरियर से अतिरिक्त आय, और अब राज्य लॉटरी जैसे विकल्पों पर विचार—ये सब संकेत हैं कि सरकार का सबसे बड़ा संकट वित्तीय संसाधनों का है। सवाल यह है कि क्या खजाना भरने की यह रणनीति जनता की जेब पर बोझ डालकर ही पूरी होगी?
शराब महंगी करने का निर्णय राजस्व के लिहाज से भले ही आकर्षक लगे, लेकिन सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से यह दोधारी तलवार है। हिमाचल जैसे छोटे और सीमित आय वाले राज्य में अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से आय बढ़ाने का अर्थ होता है—आम आदमी की जेब से पैसा निकालना। टोल टैक्स बैरियर भी इसी श्रेणी का कदम है, जो विकास के नाम पर सीधे जनता से वसूली का रास्ता बनाता है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि राजस्व बढ़ाने का बोझ आखिर किस वर्ग पर डाला जा रहा है।
राज्य लॉटरी शुरू करने की कवायद आर्थिक विवशता का सबसे स्पष्ट संकेत है। यह कदम बताता है कि पारंपरिक आय स्रोत सरकार की जरूरतों को पूरा करने में नाकाम हो रहे हैं। लॉटरी को अक्सर आसान आय का साधन माना जाता है, लेकिन इसके सामाजिक दुष्परिणाम भी कम नहीं होते। क्या हिमाचल की अर्थव्यवस्था को जुए जैसे मॉडल पर टिकाना दीर्घकालिक समाधान हो सकता है? यह बहस अभी से शुरू हो जानी चाहिए।
इसके समानांतर स्वास्थ्य क्षेत्र में 1,617 करोड़ रुपये की परियोजना, अस्पतालों में आधुनिक उपकरण, मेडिकल कॉलेजों का सशक्तिकरण—ये फैसले निस्संदेह स्वागत योग्य हैं। वर्षों से प्रदेश के मरीजों का चंडीगढ़ और दूसरे राज्यों की ओर पलायन एक बड़ी समस्या रहा है। यदि यह निवेश ईमानदारी और समयबद्ध तरीके से धरातल पर उतरता है तो यह सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि बन सकता है। लेकिन हिमाचल का अनुभव यह भी रहा है कि घोषणाएं तेज होती हैं और क्रियान्वयन धीमा।
महिला होमगार्ड को 26 सप्ताह का मातृत्व अवकाश, दिव्यांगों के विवाह अनुदान में भारी बढ़ोतरी, विधवाओं की बेटियों की शिक्षा के लिए सहायता, मातृ-शिशु पोषण योजना—ये सभी फैसले सरकार की संवेदनशील छवि को मजबूत करते हैं। यह सामाजिक सुरक्षा का वह पक्ष है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां भी मूल प्रश्न वही है—क्या आर्थिक रूप से दबाव झेल रही सरकार इन योजनाओं को लंबे समय तक निरंतर चला पाएगी?
777 स्कूलों में डिजिटल क्लासरूम और चंबा में डिजिटल विश्वविद्यालय का निर्णय भविष्य की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को ध्यान में रखकर लिया गया कदम है। यह संकेत है कि सरकार केवल वर्तमान संकट से नहीं जूझ रही, बल्कि आने वाले समय की बुनियाद भी तैयार करना चाहती है। खेल छात्रावासों का विस्तार और पीडब्ल्यूडी मंडलों का पुनर्गठन क्षेत्रीय संतुलन साधने की राजनीतिक समझ को भी दर्शाता है।
स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी और शहरी कारोबारी कल्याण नियम शहरी अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। लेकिन इन नीतियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कागज से निकलकर जमीन पर कितनी पारदर्शिता और सरलता के साथ लागू होती हैं।
असल में सुक्खू सरकार इस समय दो मोर्चों पर खड़ी है—एक तरफ खाली होता खजाना और बढ़ता कर्ज, दूसरी तरफ जनकल्याण की राजनीतिक और सामाजिक अपेक्षाएं। राजस्व बढ़ाने के लिए कठोर फैसले लेने पड़ रहे हैं, जबकि जनता को राहत देने के लिए कल्याणकारी योजनाएं भी चलानी हैं। यही इस सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा है।
आने वाला बजट इस पूरी रणनीति की असली तस्वीर सामने रखेगा। तब यह स्पष्ट होगा कि ये फैसले दूरगामी आर्थिक सुधार की दिशा में उठाए गए ठोस कदम हैं या फिर तात्कालिक राहत देकर राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश भर। हिमाचल की जनता अब घोषणाओं से ज्यादा परिणाम देखना चाहती है।
खाली खजाना, महंगे फैसले और कल्याणकारी पैकेज — सुक्खू सरकार की दोहरी परीक्षा
By RajeevBagga
On: February 13, 2026 10:16 AM




























