हिमाचल प्रदेश की राजनीति में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों को लेकर एक नई बहस तेज हो गई है। एक तरफ केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच आम जनता को राहत देने के लिए बड़ा फैसला लिया है, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश स्तर पर संभावित सेस लगाने की चर्चा ने इस राहत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बंजार विधानसभा क्षेत्र से विधायक सुरेंद्र शौरी ने केंद्र सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए इसे “जनहित में साहसिक कदम” बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी ₹13 से घटाकर ₹3 कर दी है, यानी ₹10 प्रति लीटर की सीधी राहत दी गई है। वहीं डीज़ल पर ₹10 की एक्साइज ड्यूटी को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं और तेल कंपनियों पर भारी दबाव बना हुआ है।
राहत की घोषणा, लेकिन जेब तक पहुंचेगी या नहीं?
हालांकि यह राहत कागज़ों पर बड़ी दिखती है, लेकिन वास्तविकता थोड़ी जटिल है। पेट्रोल-डीजल के दाम सीधे सरकार तय नहीं करती, बल्कि Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों और अपने घाटे के आधार पर रेट तय करती हैं।
सरकार के अनुसार, कंपनियां फिलहाल पेट्रोल पर लगभग ₹24 प्रति लीटर और डीज़ल पर ₹30 प्रति लीटर तक का नुकसान झेल रही हैं। ऐसे में एक्साइज ड्यूटी में कटौती का सीधा लाभ उपभोक्ताओं तक तुरंत पहुंचे, इसकी संभावना कम मानी जा रही है। कंपनियां इस राहत का उपयोग अपने घाटे की भरपाई में कर सकती हैं।
प्रदेश में सेस की तैयारी, सियासी संग्राम शुरू
इसी बीच हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा पेट्रोल और डीज़ल पर ₹2 से ₹5 प्रति लीटर तक अतिरिक्त सेस लगाने की संभावित योजना ने विवाद को और गहरा कर दिया है। इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सुरेंद्र शौरी ने इसे “जनता की जेब पर सीधा डाका” बताया।
उनका कहना है कि यदि यह सेस लागू होता है, तो केंद्र की ₹10 तक की राहत घटकर ₹5–₹7 रह जाएगी या कई मामलों में पूरी तरह खत्म हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार अपनी वित्तीय विफलताओं और बढ़ते कर्ज को छुपाने के लिए जनता पर नया बोझ डाल रही है।
महंगाई की मार और करों का दबाव
हिमाचल पहले ही उन राज्यों में शामिल है जहां पेट्रोल-डीजल की कीमतों में टैक्स (VAT और अन्य शुल्क) का हिस्सा 45% से अधिक है। ऐसे में अतिरिक्त सेस आम आदमी, किसानों, टैक्सी चालकों और छोटे व्यापारियों पर सीधा आर्थिक प्रहार साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से पेट्रोल-डीजल की लागत लगभग 50 से 60 पैसे प्रति लीटर तक बढ़ जाती है। वर्तमान में वैश्विक तनाव, खासकर पश्चिम एशिया में संघर्ष, तेल कीमतों को लगातार ऊपर धकेल रहा है।
तेल कंपनियों का गणित और मुनाफे का सच
तेल कंपनियों का मुनाफा केवल कीमतों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसमें रिफाइनिंग कॉस्ट, डॉलर की विनिमय दर, ट्रांसपोर्टेशन और ऑपरेशनल खर्च भी शामिल होते हैं। उदाहरण के तौर पर, इंडियन ऑयल को अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच ₹13,299 करोड़ का मुनाफा हुआ, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 370% अधिक था।
लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर बनी रहती हैं, तो यह मुनाफा तेजी से घाटे में बदल सकता है।
आने वाले समय में क्या होगा?
पेट्रोल-डीजल के दामों का भविष्य पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार और भू-राजनीतिक हालात पर निर्भर करेगा। यदि कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं या सप्लाई बाधित होती है, तो कंपनियां कीमतें बढ़ाने को मजबूर हो सकती हैं।
राजनीति बनाम राहत—जनता बीच में
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी फैसलों का वास्तविक लाभ जनता तक पहुंच पा रहा है, या फिर वह सियासी टकराव में ही उलझकर रह जाता है।
अब नजर इस बात पर है कि हिमाचल प्रदेश सरकार सेस लागू करती है या नहीं, और यदि करती है तो जनता को मिलने वाली राहत आखिर कितनी बचती है। वहीं विपक्ष ने साफ संकेत दे दिए हैं कि यदि यह फैसला लागू हुआ, तो सड़कों से लेकर विधानसभा तक इसका जोरदार विरोध होगा।
On: March 27, 2026 9:14 PM













