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    “तीन ताक़तें, एक तमाशा” —
रेगिस्तान फिर जल उठा,
पर इस बार कहानी साफ़ है—
बारूद कम, बयान ज़्यादा,
और हर चेहरा थोड़ा ख़ास है।
ईरान बोला—“हम प्रतिरोध हैं”,
इजरायल बोला—“हम सुरक्षा हैं”,
अमेरिका मुस्कुराया चुपके से—
“दोनों ही मेरी रणनीति हैं।”
मिसाइलें उड़ती कम दिखती हैं,
ट्वीट ज़्यादा दागे जाते हैं,
युद्ध अब मैदान में नहीं,
कैमरों पर लड़े जाते हैं।
तेल की बूंदों में दिखता है
मानवता का सस्ता मोल,
जहाँ शांति बिकती बोली में,
और युद्ध बने है शेयर का रोल।
संयुक्त राष्ट्र बैठा सोच रहा—
“किसे निंदा करें, किसे बचाएँ?”
काग़ज़ पर शांति लिखते-लिखते,
हकीकत से आँख चुराएँ।
नेता बोले—“हम शांति चाहते”,
और हथियारों की डील बढ़ाएँ,
जनता पूछे—“क्यों ये सब?”
तो राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाएँ।
टीवी डिबेट में आग लगे,
एंकर बनें रणभूमि के शेर,
सच कहीं कोने में रोता है,
झूठ का चलता है सम्राट फेर।
सीमा पर सैनिक जान गंवाए,
और सत्ता लेती श्रेय,
खून की हर बूंद से पूछो—
किसका था ये खेल, भैया?
अंत में फिर वही सवाल—
कौन जीता, कौन हारा?
जब इंसानियत हार गई,
तो क्या बचा ये सारा नज़ारा?

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