फ्रंट पेज न्यूज़ बंजार
कुल्लू जिला और मंडी जिले के सिराज क्षेत्र में मार्गशीर्ष मास की अमावस्या पर हर वर्ष दिवाली की अलग ही छटा देखने को मिलती है। शरद ऋतु के इन दो–तीन दिनों में यहां दिवाली की धूम पारंपरिक रंग में रंगी रहती है। कई स्थानों पर दिवाली के साथ रातभर चलने वाले जागरे इस पर्व की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व को और बढ़ा देते हैं।
पिछले कल कुल्लू जिला के माता गाड़ा दुर्गा मंदिर में दिवाली का पारंपरिक आयोजन संपन्न हुआ। आज मंडी सिराज के थाटा में अंबिका माता के सम्मान में विशेष दिवाली मनाई जाएगी। यह पर्व सिराज क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक आयोजन है, जिसका संबंध निरमण्ड स्थित अंबिका माता से माना जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मेले और त्योहार न केवल संस्कृति और लोकाचार के प्रतीक हैं, बल्कि पारस्परिक मेल–मिलाप और सामाजिक एकजुटता का माध्यम भी हैं। कुल्लू के इनर सराज सहित बाहरी सिराज के अधिकांश गांवों में अमावस्या के दिन दिवाली से पहले और बाद दोनों दिन पर्व मनाया जाता है।
अंधेरी रात में बड़ी–बड़ी मशालें जलाकर बुरी आत्माओं को दूर भगाने की परंपरा यहां सदियों पुरानी है। मान्यता है कि इससे गांवों में जन–धन, पशुधन, खेती–बाड़ी और प्राकृतिक संतुलन पर कोई विपत्ति नहीं आती और सुख–समृद्धि बनी रहती है।
मार्गशीर्ष अमावस्या पर मोहनी क्षेत्र में देवता रयालू नाग के देवलूओं द्वारा विशाल मशाल यात्रा निकाली जाती है। इस दौरान पारंपरिक रीति के अनुसार लोग ऊँचे सुरों में विशिष्ट गालियां बोलते हुए पूरे क्षेत्र की परिक्रमा करते हैं। गांव वापस लौटने पर एक विशाल जागरा जलाया जाता है, जिसके चारों ओर मध्यरात्रि से लेकर सुबह तक नाटी नृत्य की धुनें गूंजती रहती हैं। प्रातः लगभग 4 बजे देवता रयालू नाग का आगमन होता है, देव खेल की रस्म पूरी होने के बाद जागरे का समापन हो जाता है।
उधर छामणी, कोठी शिकारी और चेथर क्षेत्र की दिवाली कल बुढ़ी दिवाली निरमण्ड के साथ आयोजित होगी, जबकि पेखड़ी, चिपणी, नाहीं समेत कई स्थानों पर आज ही दिवाली के पारंपरिक कार्यक्रम होंगे।
पौष मास को काला महीना माना जाता है। इस अवधि में लगभग सभी देवता स्वर्ग प्रवास पर चले जाते हैं, जिससे देवकार्य को विराम मिल जाता है। इसलिए मार्गशीर्ष अमावस्या की यह दिवाली देव समाज के लिए विशेष महत्त्व रखती है और क्षेत्र की सबसे जीवंत परंपराओं में से एक मानी जाती है।

