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देव-परंपरा का विश्वविख्यात पर्व: मंडी में 15 फरवरी से शिवभक्ति का महाकुंभ

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फ्रंट पेज न्यूज़ मंडी।
हिमाचल की छोटी काशी के नाम से विख्यात मंडी एक बार फिर उस ऐतिहासिक क्षण की दहलीज पर खड़ी है, जब पूरा नगर देवध्वनियों, लोकनृत्यों और श्रद्धा की दिव्य आभा में डूब जाता है। 15 फरवरी से आरंभ होने जा रहा अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि मेला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी देव-परंपरा, लोकआस्था और सांस्कृतिक वैभव का जीवंत प्रतीक है। सात दिनों तक चलने वाला यह महापर्व मंडी को भक्ति और उल्लास के विराट रंगों से सराबोर कर देगा।


देव-मिलन: आस्था का अद्वितीय महासंगम
मंडी शिवरात्रि मेले की सबसे अनुपम और विशिष्ट परंपरा है ‘देव-मिलन’। शिवरात्रि के शुभ अवसर पर मंडी जिला और आसपास की घाटियों से सैकड़ों देवी-देवता अपने भव्य रथों और सुसज्जित पालकियों में विराजमान होकर नगर में प्रवेश करते हैं। देवकारदारों की पारंपरिक वेशभूषा, नगाड़ों की गूंज, शहनाइयों की मधुर धुन और “जय-जय कार” के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। नगर की सड़कों से गुजरती देव शोभायात्राएं लोकविश्वास, आस्था और सामूहिक श्रद्धा का ऐसा दृश्य प्रस्तुत करती हैं, जिसे शब्दों में बांध पाना कठिन है।


इतिहास के पन्नों से आज तक
मंडी शिवरात्रि मेले का इतिहास 17वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार मंडी रियासत के राजा अजबर सेन ने भगवान शिव की आराधना और उनकी कृपा प्राप्ति के उद्देश्य से इस देव-सम्मेलन की परंपरा की शुरुआत की थी। समय के साथ यह आयोजन राजकीय संरक्षण में विकसित होता हुआ आज अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त कर चुका है। परंपरा और आधुनिकता के संगम के रूप में यह मेला आज भी अपनी मूल आत्मा—देवसंस्कृति—को संजोए हुए है।
धर्म, संस्कृति और लोकजीवन का उत्सव
शिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के पावन मिलन का पर्व है, जिसे मंडी में सात दिवसीय महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, रात्रि जागरण और जलाभिषेक का क्रम चलता है। वहीं सांस्कृतिक संध्याओं में लोकनृत्य, लोकगीत, नाट्य मंचन और पारंपरिक खेल मेले को जीवंत बना देते हैं। दूर-दूर से आए कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से हिमाचली संस्कृति की विविध रंगत को मंच पर उतारते हैं।
सामाजिक समरसता और आजीविका का आधार
यह मेला सामाजिक एकता और भाईचारे का भी प्रतीक है। वर्षों बाद मिलने वाले रिश्तेदार, पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू और साझा उल्लास मेले को पारिवारिक उत्सव का रूप दे देते हैं। स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और हस्तशिल्पियों के लिए यह मेला आर्थिक संबल भी बनता है। मंडी की प्रसिद्ध हस्तकलाएं, ऊनी वस्त्र, पारंपरिक आभूषण और स्थानीय उत्पाद मेले की रौनक को कई गुना बढ़ा देते हैं।
आस्था और आधुनिकता का संतुलित रूप
समय के साथ मेले में आधुनिक व्यवस्थाएं, अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक दलों की भागीदारी और बेहतर सुविधाएं जुड़ी हैं, लेकिन इसकी आत्मा आज भी देव-परंपरा और लोकसंस्कृति में ही बसती है। यही कारण है कि मंडी शिवरात्रि मेला हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान का सबसे सशक्त प्रतीक बन चुका है।
15 फरवरी से आरंभ हो रहा यह महापर्व एक बार फिर मंडी को देवध्वनियों, श्रद्धालुओं की उमंग और लोकधुनों की मधुर गूंज से भर देगा। शिवभक्ति का यह महासंगम न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करेगा, बल्कि पूरी घाटी को संस्कृति और आस्था के अद्भुत रंगों में रंग देगा।

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