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“सड़क, सिस्टम और सैर-सपाटा”


कल कुल्लू से हमीरपुर लौटते हुए,
सोचा बंजार में साहित्य का संग हो जाएगा,
Varyam Singh जी से मिलना था तय,
पर किस्मत को शायद गड्ढों से ही प्यार हो जाएगा।


तीस किलोमीटर का सफर था छोटा सा,
पर सड़क ने महाभारत बना डाली,
कहीं खड्ड, कहीं पत्थर, कहीं धूल का साम्राज्य,
लगता था PWD ने “एडवेंचर टूर” की स्कीम निकाल डाली।


कार चली नहीं, हिचकोलों में उछलती रही,
हर मोड़ पर लगा—अब गिरी, अब गिरी,
टूरिस्ट बोले—“वाह! क्या रोमांच है भाई!”
हम बोले—“जनाब, ये सड़क है… कोई Safari नहीं!”


बंजार पहुँचे तो ट्रैफिक जाम ने स्वागत किया,
घड़ी ने कहा—“अब तो लौट जाओ भाई,”
Tara Negi जी का बना खाना रह गया इंतज़ार में,
और हम फँसे रहे सिस्टम की “अदृश्य कमाई” में कहीं।


नेताओं की संवेदनशीलता छुट्टी पर है,
जनता की आवाज़ भी जैसे सोई हुई,
एक्सीडेंट रोज़ की खबर बन गए हैं,
पर मीडिया की कलम भी कहीं खोई हुई।


कहते हैं—“हिमाचल स्वर्ग है धरती पर,”
पर सड़कें जैसे नरक का ट्रेलर दिखाती हैं,
कुल्लू से मनाली तक हाल बेहाल,
पर टूरिस्ट की भीड़ सरकार को तसल्ली दिलाती है।


CM साहब और मंत्री जी शायद “ऑनलाइन” हैं,
Ground reality से उनका WiFi कट गया,
राज चलाने का “राइट” तो उनके पास है,
पर सड़कों से उनका रिश्ता ही हट गया।


हम तो हर बार यही सोचकर आते हैं,
शायद इस बार कुछ सुधार मिल जाएगा,
पर हर बार गड्ढों का स्वागत मिलता है,
और सिस्टम हमें फिर हँसाकर चला जाएगा।


निष्कर्ष यही है जनाब—
यहाँ सड़कें नहीं, व्यंग्य चलते हैं,
और सरकार नहीं… बस “जाम” पलते हैं!

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