अप्रैल की पहली सुबह आई,
झूठ की फसल फिर लहलहाई।
सच ने चुपचाप सिर झुकाया,
झूठ ने मंच सजाकर गाया।
नेता जी बोले — “सब खुशहाल!”,
महँगाई बोली — “मैं बेमिसाल!”
विकास के पोस्टर चिपके दीवार,
गली में अब भी टूटी सरकार।
नौकरी आई बस कागज़ पर,
युवा घूमे सपनों के घर।
डिग्री लेकर खड़ा चौराहा,
कहता — “किसको दूँ मैं गवाह?”
मोबाइल में न्यूज़ चमचमाती,
सच की खबर कहीं खो जाती।
“ब्रेकिंग” में भी ब्रेक लगा है,
अंदर कुछ और, बाहर कुछ और दिखा है।
जनता बोली — “हम समझदार!”,
फिर भी हर साल बने शिकार।
मीम्स बनाकर हँसते जाते,
खुद ही खुद को मूर्ख बनाते।
अप्रैल फूल का क्या है खेल,
सालभर चलता ये पूरा मेल।
पहली तारीख बस बहाना है,
बाकी दिन भी तो ठगखाना है।
तो दोस्तों! अब आँखें खोलो,
हर मज़ाक में सच भी तो तौलो।
वरना यूँ ही हँसते-हँसते,
बन जाओगे तुम ही अप्रैल फूल सच्चे!
अप्रैल फूल: एक व्यंग्य


















