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युवा, शिक्षा, रोजगार, नशा और भविष्य: एक थकी हुई पीढ़ी की चुप कहानी


संपादकीय।

भारत को युवा देश कहा जाता है और यह सुनने में गर्व की बात भी लगती है। लेकिन जब यही युवा हर सुबह अख़बार के नौकरी वाले पन्ने से दिन की शुरुआत करता है और रात मोबाइल पर “अगली वैकेंसी कब आएगी” खोजते-खोजते सोता है, तो यह गर्व धीरे-धीरे बोझ में बदलने लगता है। शिक्षा ने उसे सपने देखने की आदत तो सिखाई, लेकिन उन्हें पूरा करने का रास्ता नहीं बताया। डिग्रियां हैं, नंबर हैं, सर्टिफिकेट हैं—लेकिन दिशा नहीं, हुनर नहीं और भरोसा नहीं।
आज का युवा पढ़ा-लिखा है, जागरूक है, महत्वाकांक्षी है—फिर भी खुद को असहाय महसूस करता है। और यही किसी भी समाज के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है: जब उसकी सबसे ताकतवर पीढ़ी भीतर से टूटने लगे।
संस्कृति, जो कभी जीवन को जोड़ती थी, अब रील और स्टेटस तक सिमट गई है। युवा अपनी ही भाषा में बात करने से झिझकने लगा है और अपनी परंपरा को “आउटडेटेड” समझने लगा है। सोशल मीडिया पर हज़ारों दोस्त हैं, लेकिन किसी से दिल की बात कहने का समय नहीं। जब इंसान अपनी जड़ों से कट जाता है, तो वह कहीं का नहीं रह जाता—न पूरी तरह आधुनिक, न पूरी तरह अपना।
रोजगार की बात आते ही यह संकट और भी गहरा हो जाता है। घर उम्मीद करता है, समाज तुलना करता है और युवा खुद से पूछता है—“गलती मेरी कहां है?” साल निकल जाते हैं, उम्र बढ़ जाती है और प्रतियोगी परीक्षाएं जीवन का स्थायी हिस्सा बन जाती हैं। मेहनत करने के बावजूद जब सम्मानजनक काम नहीं मिलता, तो आत्मविश्वास धीरे-धीरे चुपचाप टूटने लगता है। बाहर से हंसता हुआ युवा अंदर से खाली होता चला जाता है।
और यही खालीपन नशे का सबसे बड़ा बाजार बन जाता है। नशा यहां अपराध नहीं, बल्कि थके हुए मन की अस्थायी दवा बन जाता है। कोई तनाव से भागने के लिए पीता है, कोई असफलता भूलने के लिए, तो कोई सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे सुनने वाला कोई नहीं। हम नशे के खिलाफ अभियान तो चलाते हैं, लेकिन उस वजह को नहीं छूते, जो युवाओं को वहां तक धकेलती है।
सच यह है कि युवा बिगड़ा नहीं है—वह थक गया है। इंतज़ार करते-करते, उम्मीद करते-करते, खुद को साबित करते-करते। अगर शिक्षा उसे सक्षम बनाए, संस्कृति उसे सहारा दे, रोजगार उसे सम्मान दे और समाज उसे सुने—तो यही युवा देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। वरना “युवा देश” सिर्फ एक जुमला बनकर रह जाएगा, और उसके पीछे छिपी होगी एक पूरी पीढ़ी की चुप थकान।
यह सिर्फ युवाओं का संकट नहीं है। यह व्यवस्था की असफलता का आईना है।

मुकेश संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से

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