संपादकीय।
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहाँ “सुधार” और “केंद्रीकरण”, “सामाजिक न्याय” और “मेरिट”, तथा “समावेशन” और “अवसरों के संकुचन”—सब एक-दूसरे से टकरा रहे हैं। इस टकराव के केंद्र में है विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और उसके हालिया फैसले, जिनका सबसे तीखा असर सामान्य (Open/General) वर्ग पर महसूस किया जा रहा है।
UGC: नियामक या सर्वसत्तावादी?
1956 में स्थापित UGC का उद्देश्य विश्वविद्यालयों को दिशा देना था, उन पर शासन करना नहीं। लेकिन नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के बाद UGC की भूमिका एक मार्गदर्शक से अधिक एक नियंत्रक की होती दिख रही है—चाहे वह कुलपतियों की नियुक्ति हो, चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम हो, या शिक्षकों की भर्ती के नियम।
राज्य विश्वविद्यालयों तक केंद्रीय दिशा-निर्देशों का विस्तार संघीय ढांचे पर सीधा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। सवाल उठता है—क्या विविध भारत के लिए एक ही अकादमिक मॉडल उपयुक्त हो सकता है?
मेरिट का नया गणित: सुप्रीम कोर्ट और असहज सच्चाई
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बहस को और तेज़ कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार सामान्य कट-ऑफ से अधिक अंक लाता है, तो उसे सामान्य सीट पर रखा जा सकता है—और इससे आरक्षित सीटें प्रभावित नहीं होंगी।
काग़ज़ पर यह “मेरिट की जीत” लगती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि सीमित सामान्य सीटों पर प्रतिस्पर्धा और तीव्र हो गई है। सामान्य वर्ग के लिए यह स्थिति दोहरी मार जैसी है—न आरक्षण का लाभ, न ही सीटों की सुरक्षा।
हालाँकि कोर्ट ने “डबल बेनिफिट” पर रोक लगाकर संतुलन बनाने की कोशिश की है, लेकिन प्रक्रिया की जटिलता और भ्रम ने छात्रों की असुरक्षा बढ़ा दी है।
आरक्षण के भीतर आरक्षण: अंतहीन विस्तार?
SC/ST में सब-क्लासिफिकेशन और “क्रीमी लेयर” पर हालिया टिप्पणियाँ सामाजिक न्याय की दिशा में कदम मानी जा रही हैं। लेकिन सामान्य वर्ग की चिंता यह है कि— क्या आरक्षण एक अस्थायी संवैधानिक उपाय था, या यह एक स्थायी व्यवस्था बनती जा रही है?
जब हर सुधार का भार अंततः सामान्य वर्ग की सीमित सीटों पर ही पड़ता है, तो असंतोष स्वाभाविक है।
चार वर्षीय डिग्री और खोता भरोसा
चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम और मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय मॉडल से मेल खाती है, लेकिन ग्रामीण, संसाधन-विहीन विश्वविद्यालयों में यह प्रयोग छात्रों को प्रयोगशाला का चूहा बना रहा है। न रोजगार बाजार में इसकी स्पष्ट स्वीकार्यता है, न ही पर्याप्त ढांचा।
विरोध सिर्फ शोर नहीं, संकेत है
सड़क से सोशल मीडिया तक उठती आवाज़ें केवल “आरक्षण विरोध” नहीं हैं, बल्कि यह एक पीढ़ी की बेचैनी है—जो मेहनत, योग्यता और अवसर के बीच टूटते संतुलन को महसूस कर रही है।
सवाल आरक्षण बनाम मेरिट का नहीं
यह बहस आरक्षण के अस्तित्व पर नहीं, बल्कि उसके न्यायपूर्ण और संतुलित क्रियान्वयन पर है। सामाजिक न्याय और समान अवसर एक-दूसरे के विरोधी नहीं हो सकते—यदि नीति-निर्माण में संवाद, पारदर्शिता और संवेदनशीलता हो।
निष्कर्ष
UGC और सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा व्यवस्था केवल आंकड़ों और आदेशों से नहीं चलती, वह भरोसे से चलती है।
यदि सुधारों का अर्थ केवल केंद्रीकरण और अवसरों का संकुचन बन गया, तो विश्वविद्यालयों की आत्मा—उनकी स्वायत्तता और छात्रों का विश्वास—सबसे पहले खोएगा।
सवाल यह नहीं कि बदलाव हों या नहीं,
सवाल यह है—बदलाव किसके लिए, और किसकी कीमत पर?





























