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जहाँ सुकून ही पहचान है: तीर्थन घाटी में बढ़ता पर्यटन और संरक्षण का सवाल

On: January 4, 2026 6:02 PM
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फ्रंट पेज न्यूज़ बंजार।
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की पहचान लंबे समय तक कुल्लू–मनाली तक सिमटी रही, लेकिन समय के साथ यह दायरा अब पहाड़ों की उन शांत वादियों तक फैलने लगा है, जहाँ प्रकृति आज भी अपनी मौलिक अवस्था में सांस लेती है। बंजार उपमंडल की तीर्थन घाटी इसका जीवंत उदाहरण है—जहाँ ऊँचे पहाड़, घने जंगल और गुमनाम झरने आधुनिक पर्यटन के शोर से दूर एक अलग ही संसार रचते हैं।


हालिया प्राकृतिक आपदाओं के बाद तीर्थन घाटी में पर्यटन का धीरे-धीरे लौटना केवल आर्थिक गतिविधियों की बहाली नहीं, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि सैलानी अब भीड़भाड़ वाले स्थलों से हटकर शांति, आत्मिक सुकून और प्रकृति से सीधे संवाद की तलाश में हैं। यह बदलाव पर्यटन की उस नई सोच को दर्शाता है, जहाँ “देखना” नहीं बल्कि “अनुभव करना” प्राथमिकता बन रहा है।


गुमनाम झरने और अनछुई वादियाँ
तीर्थन घाटी, जो विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के लिए जानी जाती है, अपने ऊँचे पहाड़ों पर असंख्य नालों, खड्डों और झरनों को समेटे हुए है। ग्राम पंचायत श्रीकोट और कलवारी की सीमाओं में स्थित भरयाडा छो, गलयाडा छो, सराची छो जैसे झरने न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का उदाहरण हैं, बल्कि स्थानीय आस्था और परंपराओं से भी गहराई से जुड़े हुए हैं।
इन झरनों तक पहुँचना आसान नहीं—संकरी पगडंडियाँ, खड़ी चढ़ाइयाँ और घने जंगल—लेकिन शायद यही कठिनाई इन्हें अब तक “गुमनाम” बनाए रखने में सहायक रही है।
अवसर और चेतावनी
इन स्थलों पर बढ़ती पर्यटकों की दस्तक स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर लेकर आ सकती है। होम-स्टे, स्थानीय गाइड, हस्तशिल्प और ग्रामीण रोजगार को इससे बल मिल सकता है। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा होता है—क्या हम इस नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र को संभालने के लिए तैयार हैं?
ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क का बफर ज़ोन होने के कारण श्रीकोट और आसपास की वादियाँ अत्यंत संवेदनशील हैं। अनियंत्रित पर्यटन, कचरा, और बिना योजना के सड़क निर्माण इन झरनों के अस्तित्व पर खतरा बन सकता है। इसलिए विकास की दौड़ में संरक्षण को पीछे छोड़ देना भविष्य के लिए घातक सिद्ध होगा।
संतुलित पर्यटन की आवश्यकता
तीर्थन घाटी के गुमनाम झरने हमें यह सिखाते हैं कि हर सुंदर स्थल को “मुख्य पर्यटन केंद्र” बनाना जरूरी नहीं। आवश्यकता है संतुलित, सीमित और जिम्मेदार पर्यटन की—जहाँ सड़कें और पैदल मार्ग हों, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं; जहाँ सैलानी आएँ, लेकिन नियमों और स्थानीय संस्कृति के सम्मान के साथ।
यदि प्रशासन, स्थानीय पंचायतें और पर्यटक मिलकर इस संतुलन को साध पाए, तो तीर्थन घाटी के ये गुमनाम झरने केवल आकर्षण का केंद्र ही नहीं, बल्कि हिमाचल में सतत पर्यटन (Sustainable Tourism) की मिसाल भी बन सकते हैं।

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