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स्वामी विवेकानंद जयंती — युवाशक्ति, चरित्र और राष्ट्रनिर्माण

On: January 11, 2026 5:26 PM
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संपादकीय

“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”
यह केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि स्वामी विवेकानंद द्वारा भारत की युवाशक्ति को दिया गया वह कालजयी मंत्र है, जिसने एक गुलाम और आत्मविश्वास खो चुके राष्ट्र में नई चेतना का संचार किया। 12 जनवरी को मनाई जाने वाली स्वामी विवेकानंद जयंती हमें केवल उनके विचारों को स्मरण करने का नहीं, बल्कि अपने वर्तमान और भविष्य की दिशा पर गंभीर आत्मचिंतन करने का अवसर भी देती है।
स्वामी विवेकानंद ऐसे समय में पैदा हुए जब भारत मानसिक गुलामी, हीनभावना और सामाजिक जड़ता से जूझ रहा था। उन्होंने भारत को उसकी हीनता नहीं, बल्कि उसकी शक्ति का बोध कराया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कोई भी राष्ट्र केवल प्राकृतिक संसाधनों, धन या सैन्य ताकत से महान नहीं बनता, बल्कि चरित्रवान, साहसी और सेवा-भाव से ओतप्रोत नागरिकों से महान बनता है। उनके लिए धर्म का अर्थ कर्म, सेवा और मानवता था — न कि पाखंड, आडंबर या पलायन।
विवेकानंद की विचारधारा ने भारत के अनेक महान व्यक्तित्वों को दिशा दी। महात्मा गांधी ने सत्य और आत्मबल को जनआंदोलन का आधार बनाया, सुभाष चंद्र बोस ने अदम्य साहस और त्याग से स्वतंत्रता संग्राम को नई गति दी, डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक न्याय को संवैधानिक स्वरूप दिया और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने ज्ञान, अनुशासन और सपनों को राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी बनाया। इन सभी महान व्यक्तित्वों के विचारों और कर्मों में विवेकानंद की चेतना स्पष्ट रूप से झलकती है।
आज का भारत तकनीक, बाज़ार और सूचना के युग में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस प्रगति के साथ-साथ युवाओं के सामने दिशाहीनता, नशा, त्वरित सफलता का मोह, दिखावे की संस्कृति और नैतिक मूल्यों के क्षरण जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी खड़ी हैं। ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद का यह विचार अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि शिक्षा वह है जो आत्मविश्वास, निर्भीकता और सेवा-भाव पैदा करे — न कि केवल नौकरी पाने का साधन बने।
स्वामी विवेकानंद युवाओं को राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। उनका विश्वास था कि यदि युवा अनुशासन, परिश्रम और सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लें, तो कोई भी राष्ट्र अपने लक्ष्य से भटक नहीं सकता। उनका सपना एक ऐसे भारत का था जो वैज्ञानिक सोच वाला हो, सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो और आध्यात्मिक रूप से सुदृढ़ हो।
इसलिए 12 जनवरी केवल एक महान संन्यासी को याद करने का दिन नहीं, बल्कि संकल्प लेने का दिन है —
संकल्प कि हम विचारों को केवल भाषणों और पोस्टरों तक सीमित नहीं रखेंगे,
संकल्प कि हम अपने आचरण से समाज को दिशा देंगे,
और संकल्प कि हम एक जिम्मेदार नागरिक बनकर राष्ट्रनिर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएंगे।
स्वामी विवेकानंद की जयंती का सच्चा सम्मान यही है कि हम उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें और भारत को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और चारित्रिक रूप से भी महान बनाएं।

मुख्य संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से

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