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विश्व धरोहर की राह पर सतपुड़ा: तीर्थन घाटी में तैयार हुआ रणनीति का खाका, जीएचएनपी के अनुभव से मिलेगा मार्गदर्शन


फ्रंट पेज न्यूज़ बंजार (परस राम भारती)।


हिमाचल की शांत, सुरम्य और जैव विविधता से भरपूर तीर्थन घाटी एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण पर्यावरणीय पहल का केंद्र बनी, जहां सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल करवाने के लिए ठोस रणनीति तैयार करने पर गहन मंथन हुआ। देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के नेतृत्व में आयोजित इस उच्चस्तरीय बैठक ने न केवल संरक्षण के तकनीकी पहलुओं को सामने रखा, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि भारत की प्राकृतिक धरोहरों को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए अब समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।


बैठक में मध्य प्रदेश वन विभाग और मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के अधिकारियों ने ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (जीएचएनपी) के विशेषज्ञों के साथ मिलकर नामांकन प्रक्रिया के हर पहलू की समीक्षा की। चर्चा का मुख्य केंद्र यह रहा कि किस प्रकार जीएचएनपी ने अपने संरक्षण मॉडल, वैज्ञानिक दस्तावेज़ीकरण और स्थानीय समुदाय की भागीदारी के जरिए विश्व धरोहर का दर्जा हासिल किया और अब वही मॉडल सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।
जीएचएनपी के निदेशक संदीप शर्मा और डीएफओ सचिन शर्मा ने अपने अनुभव साझा करते हुए स्पष्ट किया कि विश्व धरोहर का दर्जा केवल प्राकृतिक सौंदर्य के आधार पर नहीं मिलता, बल्कि इसके लिए मजबूत संरक्षण प्रणाली, विस्तृत वैज्ञानिक प्रमाण और सतत ईको-टूरिज्म मॉडल की ठोस प्रस्तुति जरूरी होती है। उन्होंने मध्य प्रदेश की टीम को सुझाव दिया कि स्थानीय समुदाय को इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल करना सफलता की कुंजी है, क्योंकि यही लोग संरक्षण के वास्तविक भागीदार होते हैं।


इस महत्वपूर्ण बैठक में एल. कृष्णमूर्ति, राखी नंदा, प्रशांत सिंह बघेल और दिलीप कुमार यादव जैसे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे, वहीं वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के डॉ. भूमेश सिंह भदौरिया और डॉ. गौतम तालुकदार ने अपनी टीम के साथ वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण साझा किया। सभी विशेषज्ञों ने एक स्वर में माना कि सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में वह सभी गुण मौजूद हैं, जो उसे विश्व धरोहर सूची में स्थान दिला सकते हैं, बशर्ते रणनीति सटीक और क्रियान्वयन प्रभावी हो।


कार्यक्रम का आयोजन तीर्थन घाटी के गुशेनी क्षेत्र में पारंपरिक काठकुनी शैली में बने ‘सनशाइन हिमालयन कॉटेज’ में किया गया, जिसने प्रतिभागियों को हिमाचल की सांस्कृतिक और वास्तुकला की समृद्ध विरासत से रूबरू कराया। जालोरी दर्रे में हाल ही में हुई बर्फबारी ने इस आयोजन को और भी यादगार बना दिया, जहां प्राकृतिक सौंदर्य और नीति-निर्माण का अनूठा संगम देखने को मिला।


दौरे के दौरान टीम ने तीर्थन घाटी में बर्ड वाचिंग, फिशिंग और स्थानीय ट्राउट मछली फार्म का निरीक्षण किया। साथ ही, क्षेत्र में चल रही सामुदायिक आधारित ईको-टूरिज्म पहलों को भी करीब से समझा गया। इस मौके पर ईकोटूरिज्म विशेषज्ञ अंकित सूद ने स्थानीय संसाधनों के सतत उपयोग और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन पर अपने विचार प्रस्तुत किए, जो आने वाले समय में इस तरह की परियोजनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।


कार्यक्रम के समापन पर प्रतिभागियों ने हिमाचली संस्कृति की झलक का आनंद लिया, जिसमें पारंपरिक नाटी नृत्य और धाम ने सभी का मन मोह लिया। इस प्रकार तीर्थन घाटी में आयोजित यह बैठक केवल एक औपचारिक चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसा मंच बनी, जहां पर्यावरण संरक्षण, पर्यटन विकास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का संतुलित संगम देखने को मिला—और यही संतुलन भविष्य में सतपुड़ा को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

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