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संविधान का उत्सव या लोकतंत्र की असहज सच्चाई?

गणतंत्र दिवस विशेष।

26 जनवरी कोई साधारण तारीख़ नहीं। यह वह दिन है जब राष्ट्र एक साथ गंभीर चेहरा लगाकर संविधान को याद करता है—और अगले ही दिन उसे “स्थिति-परिस्थिति” के हवाले छोड़ देता है। परेड, तिरंगा और औपचारिक भाषणों के बीच संविधान को सलामी दी जाती है, बशर्ते कार्यक्रम समाप्त होते ही वह फिर से फ़ाइलों में बंद हो जाए।
1947 में आज़ादी मिली, और 26 जनवरी 1950 को देश ने संविधान अपनाया—ताकि भारत भावनाओं से नहीं, नियमों से चले। इरादा साफ़ था: राजा नहीं, क़ानून सर्वोच्च होगा; भीड़ नहीं, विवेक निर्णायक होगा। लेकिन समय के साथ हमने व्यवस्था तो अपनाई, उसकी आत्मा को “काम चलाऊ” बना दिया। संविधान नागरिक को केंद्र में रखता है, पर व्यवहार में नागरिक अक्सर चुनावी गणित में बदल जाता है।
गणतंत्र दिवस की सुबह तिरंगा पूरे सम्मान से लहराता है। कैमरे सही कोण तलाशते हैं, राष्ट्रगान के साथ देशभक्ति अपने चरम पर पहुँचती है—ठीक उतनी देर, जितनी देर मंच पर कार्यक्रम चलता है। उसके बाद वही तिरंगा ट्रैफ़िक नियम तोड़ने, नफ़रत भरे भाषणों और “मेरा अधिकार पहले” की बहसों के शोर में कहीं पीछे छूट जाता है।
संविधान की प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे सुरीले शब्दों से शुरू होती है, लेकिन ज़मीनी रियाज़ कुछ और कहानी कहता है। न्याय तारीख़ों में उलझा है, समानता आरक्षण बनाम अवसर की बहस में फँसी है, स्वतंत्रता “मेरी बात सही, बाक़ी देशद्रोह” के शोर में दब गई है, और बंधुत्व सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी के सामने बौना पड़ गया है।
26 जनवरी हमें आईना दिखाता है—और शायद इसी कारण यह दिन कईयों को असहज भी करता है। सवाल सीधे हैं: क्या लोकतंत्र आज संवाद है या सिर्फ़ डिबेट शो? क्या असहमति अब भी नागरिक अधिकार है या संदेह का प्रमाण? क्या संविधान सर्वोच्च है, या सुविधा के अनुसार बदला जाने वाला दस्तावेज़?
आज अधिकारों की बातें इतनी तेज़ हैं कि कर्तव्य माइक्रोफ़ोन तक पहुँच ही नहीं पाते। अभिव्यक्ति की आज़ादी सब चाहते हैं, पर सुनने की आज़ादी देने में हिचक होती है। लोकतंत्र को हम अक्सर चुनावी जीत तक सीमित कर देते हैं, जबकि संविधान रोज़मर्रा के संयम, सहिष्णुता और ज़िम्मेदारी की परीक्षा लेता है।
26 जनवरी का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि हम संविधान की क़सम खाते हैं—और सबसे ज़्यादा चुनौती भी उसी को देते हैं; सड़क पर, संसद में और सोशल मीडिया पर। हम भूल जाते हैं कि लोकतंत्र कोई रियलिटी शो नहीं, जहाँ सबसे ऊँची आवाज़ जीत जाए।
अंततः यह दिन याद दिलाता है कि भारत किसी एक विचार का मोनोलॉग नहीं, बल्कि अनेक विचारों का संवाद है। यह संवाद तभी बचेगा जब संविधान केवल समारोहों का नायक नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार का मार्गदर्शक बने। वरना हर 26 जनवरी तिरंगा तो लहराएगा, पर सवाल वही रहेगा—गणतंत्र का उत्सव और   लोकतंत्र की असहज सच्चाई में अन्तर!

मुख्य संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से

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