संपादकीय |
हिमाचल प्रदेश में सेवानिवृत्त कर्मचारियों और अधिकारियों को बार-बार पुनर्नियुक्ति या सेवा विस्तार देना अब एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि युवा-विरोधी नीति के रूप में देखा जाने लगा है। हालिया उदाहरणों में पटवारी कानूनगो आदि पदों पर सेवानिवृत्त कर्मियों को दोबारा रखना, अन्य विभागों में भी रिटायर कर्मचारियों से काम लेना—ये सभी फैसले उस समय लिए जा रहे हैं, जब प्रदेश का पढ़ा-लिखा युवा बेरोज़गारी की लंबी कतार में खड़ा है। यह स्थिति न केवल अवसरों की चोरी है, बल्कि सामाजिक असंतोष को खुला निमंत्रण भी।
आंकड़े इस असंतुलन की गंभीरता को साफ दिखाते हैं। रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत बेरोज़गारों में लाखों की संख्या शिक्षित युवाओं की है, जिनमें स्नातक, स्नातकोत्तर और तकनीकी डिग्रीधारी शामिल हैं। हर वर्ष राज्य के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से हजारों नए युवा निकलते हैं, जबकि नियमित सरकारी भर्तियों की संख्या लगातार सीमित होती जा रही है। कई विभागों में हजारों पद वर्षों से खाली हैं, लेकिन उन्हें भरने के बजाय रिटायर कर्मचारियों से काम लिया जा रहा है। इसका सीधा अर्थ है—नई नियुक्तियों का रास्ता बंद और युवाओं का भविष्य अधर में।
यह नीति केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक संकट को जन्म दे रही है। बेरोज़गारी के कारण युवाओं में अवसाद, हताशा और आक्रोश बढ़ रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में उम्र, समय और पैसा गंवाने के बाद जब अवसर की जगह पुनर्नियुक्ति दिखाई देती है, तो भरोसा टूटता है। यही टूटा भरोसा सड़कों पर धरनों, प्रदर्शनों और आंदोलनों के रूप में सामने आ रहा है। यह स्पष्ट संकेत है कि हिमाचल में एक “पढ़े-लिखे बेरोज़गारों की फौज” तैयार हो रही है, जिसे अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जिन पदों पर पुनर्नियुक्ति दी जा रही है—जैसे पटवारी, क्लर्क, तकनीकी सहायक—उनके लिए राज्य में पर्याप्त प्रशिक्षित युवा उपलब्ध हैं। इसके बावजूद रिटायर कर्मचारियों को बनाए रखना यह संदेश देता है कि योग्यता, परीक्षा और मेहनत का कोई मूल्य नहीं, जबकि उम्र और सेवा-काल ही प्राथमिकता है। यह नीति न केवल युवाओं का मनोबल तोड़ती है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को भी जड़ बना देती है।
यदि यही सिलसिला जारी रहा, तो बेरोज़गारी खत्म होने के बजाय असंतोष और अविश्वास और गहराएगा। सवाल अब यह नहीं है कि पुनर्नियुक्ति सुविधाजनक है या नहीं, बल्कि यह है कि हिमाचल का भविष्य किसके हाथों में सौंपा जा रहा है—अतीत में सेवा दे चुके लोगों के, या वर्तमान में अवसर की प्रतीक्षा कर रहे युवाओं के। जब तक नियमित भर्तियाँ, पारदर्शी प्रक्रियाएँ और युवा-केंद्रित नीति नहीं अपनाई जाती, तब तक यह मान लेना चाहिए कि यह व्यवस्था बेरोज़गारी घटाने नहीं, बल्कि उसे स्थायी बनाने की दिशा में बढ़ रही है।





























