फ्रंट पेज न्यूज़ बंजार (कुल्लू):
हिमाचल प्रदेश के पीएम श्री राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला बंजार में प्रवेश प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न स्थिति ने न केवल स्थानीय स्तर पर शिक्षा की उपलब्धता को प्रभावित किया है, बल्कि राज्य की शिक्षा नीति और उसके क्रियान्वयन पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
1 अप्रैल से प्रारंभ हुई प्रवेश प्रक्रिया में मात्र 2 अप्रैल तक ही अधिकांश कक्षाओं की सीटें भर गईं। कक्षा 1 से 5 तक 40-40 विद्यार्थियों तथा कक्षा 6 से 8 तक 80-80 विद्यार्थियों (दो सेक्शन) की निर्धारित सीमा पूरी हो चुकी है। इसके चलते बड़ी संख्या में विद्यार्थी प्रवेश से वंचित रह गए हैं और अभिभावकों को वैकल्पिक स्कूलों की तलाश करनी पड़ रही है।
स्थानीय स्तर पर बढ़ती असुविधा और असमानता
प्राथमिक विद्यालय के आसपास लगभग 2-4 कोई प्राथमिक विद्यालय नहीं,और 10- 12 किलोमीटर के दायरे में कोई सरकारी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय उपलब्ध न होने के कारण स्थिति और गंभीर हो गई है। कई अभिभावकों को बच्चों को दूर-दराज के क्षेत्रों में भेजना पड़ रहा है या फिर निजी विद्यालयों का सहारा लेना पड़ रहा है, जो हर परिवार के लिए आर्थिक रूप से संभव नहीं है।
सामाजिक और आर्थिक दबाव का व्यापक असर
यह समस्या केवल प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी देखने को मिल रहा है।
जब अभिभावक अपनी आय का बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने को मजबूर होते हैं, तो इसका असर स्वास्थ्य, बचत और जीवन स्तर पर पड़ता है। कई बार यही दबाव पारिवारिक तनाव का कारण बनता है, जिसका प्रभाव बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर भी पड़ता है।
विडंबना यह है कि जिस शिक्षा को बेहतर भविष्य का आधार माना जाता है, वही कई बार वर्तमान को तनावपूर्ण बना देती है।
“बोर्ड नहीं, व्यवस्था सुधार ही समाधान”
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या का समाधान केवल बोर्ड परिवर्तन में नहीं है।

सेवानिवृत्ति प्रिंसिपल केसरी चौहान का कहना है कि एनसीईआरटी का सिलेबस ही मूल आधार है—सीबीएसई में इसे 100% लागू किया जाता है, जबकि राज्य बोर्ड में लगभग 75%। ऐसे में केवल बोर्ड बदलने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार संभव नहीं है।
उनके अनुसार,
“जरूरत समान पैटर्न, समान संसाधन और समान अवसर की है, ताकि शिक्षा व्यवस्था मजबूत हो सके।”
शिक्षा के उद्देश्य पर भी उठे सवाल
वर्तमान स्थिति एक बड़े प्रश्न को जन्म देती है—क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक, परिणाम और रोजगार तक सीमित रह गया है, या यह बच्चों के समग्र विकास का माध्यम होना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब शिक्षा एक “व्यापार” का रूप ले लेती है, तो स्कूल ज्ञान से अधिक परिणाम और रैंकिंग पर ध्यान देने लगते हैं, जिससे शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है।
नीतिगत सुधार और पारदर्शिता की आवश्यकता
स्थिति के समाधान के लिए निम्न बिंदुओं पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है:
1)अभिभावक संघों को सशक्त बनाया जाए।
2)सरकारी शिक्षा प्रणाली को मजबूत कर उसे एक प्रभावी विकल्प बनाया जाए ।
3)शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त कर शिक्षण गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
4)मॉनिटरिंग और निरीक्षण प्रणाली को सुदृढ़ किया जाए।
तकनीक की भूमिका भी महत्वपूर्ण
ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ओपन संसाधनों के माध्यम से शिक्षा को अधिक सुलभ और किफायती बनाया जा सकता है। हालांकि इसके लिए मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और जागरूकता आवश्यक है।
प्रदेशभर में उभरती समान स्थिति
यह समस्या केवल बंजार तक सीमित नहीं है। प्रदेश के कई क्षेत्रों में, जहां पीएम श्री विद्यालयों में सीमित सीटों के साथ कक्षा 1 से 12 तक समायोजन किया गया है, वहां भी इसी प्रकार की परिस्थितियां सामने आ रही हैं। इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं यह सुधार प्रयास असंतुलित “प्रयोग” बनकर शिक्षा व्यवस्था को और जटिल न बना दे।
क्या यह असमंजस निजी स्कूलों को बढ़ावा देगा?
वर्तमान स्थिति एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है—एक ओर सरकार सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने का प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी ओर सीमित सीटों और अव्यवस्था के कारण अभिभावक निजी विद्यालयों की ओर जाने को मजबूर हो रहे हैं।
क्या इस असमंजसपूर्ण स्थिति में सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाना संभव हो पाएगा?
या फिर यह परिस्थितियां अनजाने में निजी शिक्षा को बढ़ावा देंगी?
स्पष्ट है कि शिक्षा में सुधार केवल नीतिगत घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर संतुलित और समावेशी क्रियान्वयन से संभव है।
यदि समय रहते समान अवसर, समान संसाधन और मजबूत सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली सुनिश्चित नहीं की गई, तो शिक्षा और अधिक असमान एवं जटिल होती जाएगी।
अंततः सवाल केवल प्रवेश या फीस का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य का है।
शिक्षा वह माध्यम होना चाहिए जो समाज को जोड़े—न कि उसे विभाजित करे।
सेवानिवृत्ति प्रवक्ता प्रेम सिंह ठाकुर का मानना है कि यदि इस व्यवस्था को लागू करना ही था तो इससे पहले व्यवस्थागत बनाकर छठी कक्षा से आरंभ किया जा सकता था लेकिन वर्तमान स्थिति ने इसे उहापोह की स्थिति बना दी है।

कनिष्ठ बुनियादी अध्यापक के पद से सेवानिवृत भूतपूर्व सैनिक महेंद्र शर्मा का कहना है कि प्राथमिक विद्यालय में इससे बहुत ही परेशानी हो रही है। विभाग का “लोगो” था “पहले आओ पहले पाओ” लेकिन इस के अतिरिक्त जो बच्चे बच रहे हैं उन्हें बहुत परेशानी हो रही है और नजदीक में कोई भी पाठशाला नहीं होने से क्या बच्चे दो-चार किलोमीटर दूर पढ़ने जाएंगे?

राजकीय पीएमश्री वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला बंजार की प्रधानाचार्या सुनीता ठाकुर का कहना है कि सरकार के दिशा निर्देश अनुसार जो नियमावली है उसके तहत बच्चों को दाखिला दिया जा रहा है।













