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पंचायत कार्यकाल समाप्त: अब आत्ममंथन और जागरूकता का समयभ्रष्टाचार, बजट हेराफेरी और पारदर्शिता पर उठे सवाल

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फ्रंट पेज न्यूज़ बंजार (परस राम भारती)
हिमाचल प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। यह दौर केवल पद छोड़ने या आगामी चुनावों की तैयारी का नहीं, बल्कि आत्ममंथन, मूल्यांकन और जवाबदेही का है। अब यह परखना ज़रूरी हो गया है कि पंचायत प्रतिनिधियों ने अपने कार्यकाल में जनता की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरकर काम किया और किन मोर्चों पर वे असफल रहे।
जमीनी हकीकत यह भी है कि कुछ प्रधानों और उपप्रधानों ने ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्ठा से कार्य किया, जिसके चलते उन्हें जनता का भरोसा और सम्मान मिला। वहीं कई स्थानों पर भ्रष्टाचार, लापरवाही और निजी स्वार्थ के कारण जनप्रतिनिधियों को जनता की नाराज़गी झेलनी पड़ी। स्पष्ट है कि जनप्रतिनिधि की असली पहचान उसके कार्यों से बनती है, न कि केवल घोषणाओं और वादों से।
पंचायत से शुरू होता भ्रष्टाचार?
पंचायत स्तर पर होने वाला भ्रष्टाचार एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। आम धारणा है कि भ्रष्टाचार की जड़ें ग्राम पंचायतों से शुरू होकर ब्लॉक, ज़िला, प्रदेश और अंततः केंद्र तक फैल जाती हैं। पंचायतों को हर वर्ष करोड़ों रुपये का बजट मिलता है, लेकिन काग़ज़ों में दिखने वाला विकास अक्सर ज़मीन पर दिखाई नहीं देता। यही अंतर बजट की हेराफेरी और कमीशनखोरी की ओर इशारा करता है।
स्थानीय लोगों का सुझाव है कि यदि पंचायत विकास कार्यों के लिए आने वाले धन को वार्ड स्तर पर जनता की समितियों के माध्यम से खर्च किया जाए, तो पारदर्शिता बढ़ेगी और धन का सही उपयोग सुनिश्चित होगा। इससे न केवल कार्यों की गति तेज़ होगी, बल्कि भ्रष्टाचार पर भी प्रभावी अंकुश लगेगा।
हर जनप्रतिनिधि दोषी नहीं
यह भी स्वीकार करना होगा कि हर प्रधान या उपप्रधान गलत नहीं होता। कुछ जनप्रतिनिधि बिना किसी लालच के, पूरी ईमानदारी से जनता की सेवा करते हैं। दुर्भाग्यवश ऐसे उदाहरण कम हैं। इसके साथ ही विभिन्न विभागों में भी कमीशनखोरी और घोटालों की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं, जिसका सीधा नुकसान आम नागरिक को उठाना पड़ता है।
जनता की भूमिका सबसे अहम
इस विषय पर गुमान सिंह, राष्ट्रीय संयोजक हिमालय नीति अभियान, का कहना है कि मौजूदा तंत्र में सबसे अधिक नुकसान गरीब और आम नागरिक का होता है, जिसकी आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है। उन्होंने आम जनता से अपील की कि आगामी पंचायतीराज चुनावों में अपने मताधिकार का जिम्मेदारी से उपयोग करें।
उनका कहना है कि थोड़े से लालच या निजी लाभ के लिए दिया गया वोट न केवल पंचायत, बल्कि पूरे देश के भविष्य के लिए घातक साबित होता है। यदि विकास को सही दिशा देनी है, तो नीति, नियत और नेतृत्व—तीनों को सुधारना होगा। ईमानदार, योग्य और जनहित में सोचने वाले लोगों को ही नेतृत्व सौंपना समय की मांग है।

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