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हिमाचल में पंचायत चुनाव नियमों में बड़ा बदलाव: नशा मामलों में आरोप तय होते ही प्रधान पद जाएगा, कोरम के लिए 10% आवश्यक।



हाईकोर्ट की मंजूरी के बाद पंचायत राज व्यवस्था में सख्ती, अवैध कब्जाधारकों और डिफॉल्टरों पर भी चुनाव लड़ने पर रोक


शिमला/कुल्लू:
हिमाचल प्रदेश में पंचायत राज संस्थाओं को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए राज्य सरकार ने चुनाव नियमों में अहम बदलाव किए हैं। इन संशोधनों को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की मंजूरी भी मिल चुकी है, जिसके बाद इन्हें लागू करने का रास्ता साफ हो गया है।
मुख्य बदलाव क्या हैं?


1. नशा (चिट्टा) मामलों में सख्ती
नए प्रावधानों के अनुसार यदि किसी पंचायत प्रतिनिधि, विशेषकर प्रधान, के खिलाफ नशा तस्करी (चिट्टा) के मामले में अदालत द्वारा आरोप तय (charges framed) हो जाते हैं, तो उसे तुरंत प्रभाव से पद से हटाया जा सकेगा। पहले ऐसे मामलों में लंबी कानूनी प्रक्रिया के चलते कार्रवाई में देरी होती थी।
2. कोरम के लिए 10% उपस्थिति अनिवार्य
अब ग्राम सभा की बैठक को वैध मानने के लिए कुल मतदाताओं में से कम से कम 10 प्रतिशत की उपस्थिति जरूरी होगी।


पहले कई जगह कोरम पूरा न होने के बावजूद बैठकें औपचारिक रूप से कर ली जाती थीं।
नए नियम से निर्णय प्रक्रिया में जनभागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास है।
3. अवैध कब्जाधारकों और डिफॉल्टरों पर रोक
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि:
सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करने वाले
बिजली/पानी/सरकारी देनदारियों के डिफॉल्टर
ऐसे लोग अब पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य होंगे।
4. परिवार आधारित उपस्थिति मान्य नहीं
कोरम पूरा करने के लिए एक ही परिवार के कई सदस्यों की उपस्थिति को मान्यता नहीं दी जाएगी। इससे वास्तविक जनभागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।
सरकार का उद्देश्य
राज्य सरकार के अनुसार इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य पंचायत स्तर पर:
भ्रष्टाचार और आपराधिक प्रभाव को कम करना


पारदर्शिता बढ़ाना
निर्णय प्रक्रिया में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना
विशेष रूप से नशा तस्करी जैसे गंभीर मामलों में सख्ती को ग्रामीण प्रशासन को स्वच्छ बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
संभावित प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि इन नियमों के लागू होने से:
पंचायतों में जवाबदेही बढ़ेगी
जनसभाओं में वास्तविक भागीदारी बढ़ेगी
विवादित और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की राजनीति में एंट्री सीमित होगी
हालांकि, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि “आरोप तय होते ही पद से हटाने” का प्रावधान संवैधानिक बहस को जन्म दे सकता है, क्योंकि अंतिम दोष सिद्ध होने से पहले ही कार्रवाई होगी।

हिमाचल सरकार का यह कदम पंचायत राज व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक बड़ा और सख्त निर्णय माना जा रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि इन नियमों का जमीनी स्तर पर कितना प्रभावी क्रियान्वयन हो पाता है।

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