मुख्य संपादक प्रमेश शर्मा, फ्रंट पेज न्यूज़

हिमाचल प्रदेश के ऊपरी पहाड़ी क्षेत्रों में हाल के दिनों में आगजनी की घटनाएं केवल दुर्घटनाएं नहीं रहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आई हैं। मंडी, कुल्लू और शिमला जिलों के ऊंचाई वाले इलाकों में बीते डेढ़ माह के भीतर चार गांवों का आग की चपेट में आना इस बात का संकेत है कि पहाड़ों में जीवन और सुरक्षा से जुड़ी हमारी व्यवस्थाएं कमजोर होती जा रही हैं। विशेष रूप से कुल्लू जिले के बंजार उपमंडल अंतर्गत नोहंडा क्षेत्र में लगातार हो रही घटनाएं प्रशासन, समाज और जनप्रतिनिधियों—सभी के लिए आत्ममंथन का विषय हैं।
1 जनवरी 2025 तांदी गांव का अग्निकांड भयानक तो था ही
सबसे भयावह घटना नोहांडा पंचायत के झनयार गांव में सामने आई, जहां दिन के उजाले में लगी आग ने देखते ही देखते 16 रिहायशी मकानों को राख में बदल दिया। राहत की बात यह रही कि प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाई, किंतु यह सहायता जले हुए घरों और उजड़े जीवन की भरपाई नहीं कर सकती। इसके कुछ ही दिनों बाद इसी पंचायत के नाही गांव में आग लगने की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह कोई एकाकी हादसा नहीं, बल्कि एक खतरनाक सिलसिले की शुरुआत है।
19 दिसंबर 2025 को पंचायत पेखड़ी के पेखड़ी गांव में लगी आग इस संकट की गंभीरता को और उजागर करती है। तीन खलह/छानकों के जल जाने के बावजूद गांव का बच जाना केवल ग्रामीणों की सतर्कता और सामूहिक प्रयास का परिणाम था। यदि समय पर आग पर काबू न पाया गया होता, तो 70–80 घरों वाला यह घना गांव भी बड़ी त्रासदी का शिकार हो सकता था। यह घटना बताती है कि पहाड़ों में आग से सुरक्षा आज भी व्यवस्था से अधिक संयोग पर निर्भर है।
इन घटनाओं के कारणों पर दृष्टि डालें तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है। ऊंचे और बर्फीले हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों के लिए पशुओं हेतु बड़ी मात्रा में सूखी घास एकत्र की जाती है, जिसे खलह या छानकों में रखा जाता है। पहले पशुओं को घरों की निचली मंजिलों में रखने की परंपरा थी, जिससे आग का जोखिम सीमित रहता था। लेकिन बदलती जीवनशैली और निर्माण पद्धतियों के कारण अब पशु अलग खलहों में रखे जा रहे हैं, जहां सूखी घास आग का सबसे बड़ा स्रोत बन चुकी है।
इसके साथ ही बीड़ी-सिगरेट, शराब के नशे में की गई लापरवाही, पर्व-त्योहारों पर पटाखों का प्रयोग, खराब बिजली वायरिंग और गांवों में सटे हुए लकड़ी के मकान आग को तेजी से फैलने का अवसर देते हैं। देवदार और कैल जैसी रेज़िनयुक्त लकड़ी से बने बहुमंजिला घर, तंग रास्ते और पानी की कमी इस खतरे को और बढ़ा देते हैं। जंगलों में आग और गांवों के आसपास कचरा जलाने की प्रवृत्ति भी इस समस्या को गंभीर बना रही है।
यह भी स्मरणीय है कि बंजार क्षेत्र के तांदी, कोटला और मोहनी गांव पहले ही इस तरह की आगजनी झेल चुके हैं। मंडी जिले के सराज क्षेत्र, बालीचौकी के डाहर और जंजैहली के केउली गांव भी ऐसी त्रासदियों के साक्षी रहे हैं। इसके बावजूद यदि सबक नहीं लिया गया, तो आने वाला समय और भी भयावह हो सकता है।
अब आवश्यकता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में आग को “दुर्घटना” मानकर नजरअंदाज करने के बजाय इसे एक गंभीर संरचनात्मक समस्या के रूप में देखा जाए। खलह/छानकों और रिहायशी मकानों के बीच सुरक्षित दूरी सुनिश्चित की जाए, गांवों में जल भंडारण की स्थायी व्यवस्था विकसित की जाए और अग्निशमन सेवाओं की पहुंच दूरदराज गांवों तक बढ़ाई जाए। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ग्राम पंचायतों और ग्राम सभाओं की है, जिन्हें निर्माण नियमों, सुरक्षा मानकों और जन-जागरूकता अभियानों को सख्ती से लागू करना होगा।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में पहाड़ पहले ही प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहे हैं। यदि समय रहते लापरवाही, अव्यवस्थित निर्माण और परंपरागत ज्ञान की अनदेखी पर रोक नहीं लगी, तो आग की ये घटनाएं केवल संपत्ति ही नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ी समाज की सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न बन जाएंगी।












